तुम्मिडिहट्टी बैराज पर तेलंगाना की नई पहल, सिंचाई विवाद फिर चर्चा में
तेलंगाना ने उत्तर क्षेत्र की सिंचाई जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तुम्मिडिहट्टी बैराज की प्रस्तावित ऊंचाई बढ़ाने के लिए केंद्र से हस्तक्षेप मांगा है। मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने 5 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल से मुलाकात कर महाराष्ट्र के साथ लंबे समय से चले आ रहे मतभेद को सुलझाने की अपील की। यह मुद्दा प्राणहिता-चेवेला सिंचाई परियोजना से जुड़ा है, जिसे राज्य की जल-योजना में अहम माना जाता है।
प्राणहिता-चेवेला परियोजना और बैराज का महत्व
तुम्मिडिहट्टी बैराज काउथाला मंडल के पुराने आदिलाबाद जिले के तुम्मिडिहट्टी गांव में प्राणहिता नदी पर प्रस्तावित है। यह नदी गोदावरी नदी प्रणाली की एक सहायक धारा है, इसलिए यह इलाका अंतर-राज्यीय जल-विवादों के केंद्र में रहा है। तेलंगाना का कहना है कि 150 मीटर की ऊंचाई वाला बैराज उत्तर तेलंगाना तक पानी पहुंचाने में अधिक उपयोगी होगा और इससे गुरुत्वीय प्रवाह के जरिए सिंचाई संभव होगी। राज्य के अनुसार, यदि बैराज की ऊंचाई 148 मीटर तक सीमित रहती है, तो उत्तर तेलंगाना की जल-आवश्यकताओं को पूरा करना कठिन होगा। इसी वजह से तेलंगाना सरकार ने 150 मीटर की ऊंचाई पर जोर दिया है। सरकार का तर्क है कि इससे राज्य को अपने आवंटित गोदावरी जल का बेहतर उपयोग करने में मदद मिलेगी और महंगी लिफ्ट सिंचाई प्रणालियों पर निर्भरता घटेगी।
महाराष्ट्र के साथ सहमति और तकनीकी पहलू
महाराष्ट्र पहले 148 मीटर की ऊंचाई पर सहमत हुआ था, लेकिन अब तेलंगाना इस सीमा को बढ़ाने की मांग कर रहा है। 27 मई 2026 को मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिखकर बैराज की ऊंचाई और निर्माण की रूपरेखा पर बैठक करने का अनुरोध किया था। इसके बाद 2 मई 2026 की एक बैठक में इंजीनियरिंग विशेषज्ञों ने कहा था कि 150 मीटर ऊंचाई वाला बैराज कम से कम 100 टीएमसीएफटी पानी के उपयोग में मदद कर सकता है। इस विवाद में एफआरएल यानी फुल रिजर्वायर लेवल की भूमिका भी अहम है। यह वह अधिकतम जल-स्तर होता है, जिसके अनुसार किसी बैराज या जलाशय की डिजाइन तय की जाती है। तेलंगाना का कहना है कि 148 मीटर का एफआरएल उत्तर तेलंगाना की जरूरतों के लिए पर्याप्त नहीं होगा।
जल-प्रबंधन, डूब क्षेत्र और आगे की राह
तेलंगाना ने यह भी कहा है कि 150 मीटर की ऊंचाई पर भी महाराष्ट्र में डूब क्षेत्र 1,000 हेक्टेयर से कम रहेगा। डूब क्षेत्र वह भूमि होती है जो बैराज या जलाशय बनने के बाद पानी में समा जाती है। इस मुद्दे पर केंद्र की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि यह दो राज्यों के बीच जल-साझेदारी, तकनीकी स्वीकृति और निर्माण की शर्तों से जुड़ा मामला है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- प्राणहिता नदी गोदावरी नदी प्रणाली की एक सहायक नदी है।
- एफआरएल का अर्थ Full Reservoir Level होता है, यानी जलाशय का अधिकतम डिजाइन जल-स्तर।
- टीएमसीएफटी का पूरा रूप thousand million cubic feet है, जिसका उपयोग बड़े जल-आयतन को मापने में होता है।
- लिफ्ट सिंचाई में पानी को पंप से ऊंचाई तक पहुंचाया जाता है, जबकि गुरुत्वीय प्रवाह में प्राकृतिक ढलान का उपयोग होता है।
तुम्मिडिहट्टी बैराज पर यह ताजा पहल दिखाती है कि अंतर-राज्यीय जल परियोजनाओं में तकनीकी निर्णय और राजनीतिक सहमति दोनों समान रूप से जरूरी होते हैं। अब निगाहें केंद्र की मध्यस्थता और महाराष्ट्र के साथ होने वाली आगे की बातचीत पर रहेंगी।