डिजिटल अरेस्ट धोखाधड़ी पर बैंकों की जवाबदेही तय करेगा सुप्रीम कोर्ट

डिजिटल अरेस्ट धोखाधड़ी पर बैंकों की जवाबदेही तय करेगा सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से डिजिटल अरेस्ट धोखाधड़ी रोकने के लिए नियामकीय उपाय तय करने को कहा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यदि बैंक की उचित जांच-पड़ताल में कमी के कारण किसी ग्राहक के साथ धोखाधड़ी होती है, तो बैंक को नुकसान की पूरी राशि या उससे कम नहीं, उतनी राशि की भरपाई करनी चाहिए।

आरबीआई के नए नियमों पर विचार

अदालत आरबीआई के प्रस्तावित ‘अपने ग्राहक को जानें’ (केवाईसी) संशोधन निर्देश, 2026 की समीक्षा कर रही है। इन निर्देशों को 30 नवंबर 2026 तक अधिसूचित किए जाने और 31 दिसंबर तक लागू करने की अपेक्षा है। सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि किसी खाते में असामान्य लेन-देन होने पर उसे अस्थायी रूप से रोका जा सके। साथ ही, संदिग्ध गतिविधि की सूचना पुलिस को स्वतः भेजने और ग्राहक का भौतिक सत्यापन करने जैसे सुरक्षा उपायों पर भी विचार किया जाए।

धोखाधड़ी की गंभीरता और बैंकों की भूमिका

पीठ ने डिजिटल अरेस्ट को देश की सबसे बड़ी वित्तीय धोखाधड़ी बताते हुए कहा कि 29 अक्टूबर 2026 तक इससे अर्थव्यवस्था को 800 करोड़ रुपये से अधिक का शुद्ध नुकसान हुआ है। अदालत ने कुछ मामलों में बैंक कर्मचारियों की संलिप्तता का उल्लेख करते हुए पूछा कि क्या आरबीआई सख्त नियम बनाने में ढिलाई बरत रहा है।

अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने अदालत को बताया कि 2025 की तुलना में 2026 में दर्ज मामलों में 50 प्रतिशत की कमी आई है। उन्होंने यह भी कहा कि 11 लाख से अधिक मामलों में रकम वापस कराई गई है। ये आंकड़े सरकारी पक्ष की ओर से अदालत में रखे गए।

यह स्वतः संज्ञान वाली कार्यवाही एक बुजुर्ग दंपति से जुड़ी घटना के बाद शुरू हुई थी। ठगों ने अधिकारियों का रूप धरकर उनसे 1.05 करोड़ रुपये ठग लिए थे। डिजिटल अरेस्ट के नाम पर अपराधी अक्सर वीडियो कॉल के जरिए लंबे समय तक संपर्क में रहते हैं और गिरफ्तारी या कानूनी कार्रवाई की धमकी देकर पीड़ितों से धन हस्तांतरित करवाते हैं अथवा उनकी गोपनीय जानकारी हासिल करते हैं।

निगरानी और ग्राहक सुरक्षा की जरूरत

धोखाधड़ी की रकम को छिपाने के लिए अपराधी दूसरे लोगों के खातों, जाली या अपने नियंत्रण में ली गई सिम और कई स्तरों पर धन हस्तांतरण का सहारा ले सकते हैं। ऐसे मामलों में बैंक की ग्राहक-जांच प्रक्रिया और संदिग्ध लेन-देन की पहचान अहम है। प्रस्तावित सुरक्षा उपायों का उद्देश्य असामान्य गतिविधि पर जल्दी कार्रवाई करना और पीड़ित की रकम निकलने से पहले जोखिम कम करना है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

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  • ‘अपने ग्राहक को जानें’ प्रक्रिया में ग्राहक की पहचान के साथ कारोबारी संबंध का उद्देश्य और वित्तीय अपराध का जोखिम भी परखा जाता है।
  • संदिग्ध लेन-देन की पहचान और उसकी रिपोर्टिंग ग्राहक-जांच व्यवस्था का अहम हिस्सा है।
  • भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम के तहत भुगतान प्रणालियों पर आरबीआई को नियामकीय और पर्यवेक्षी अधिकार प्राप्त हैं।
  • डिजिटल अरेस्ट धोखाधड़ी में ठग सरकारी या जांच एजेंसी के अधिकारी बनकर डर और दबाव के जरिए धन या गोपनीय जानकारी हासिल करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की पहल का केंद्र केवल ठगी के बाद रकम लौटाना नहीं, बल्कि बैंकिंग व्यवस्था में समय रहते जोखिम पहचानना और ग्राहकों को होने वाले नुकसान की जवाबदेही तय करना है।

Originally written on October 30, 2026 and last modified on October 30, 2026.

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