ग्रेट निकोबार वनाधिकार विवाद में केंद्र की आपत्ति

ग्रेट निकोबार वनाधिकार विवाद में केंद्र की आपत्ति

ग्रेट निकोबार द्वीप पर वनाधिकारों की मान्यता को लेकर चल रहे मामले में केंद्र सरकार ने चार निकोबारी आवेदकों के हस्तक्षेप का विरोध किया है। जनजातीय कार्य मंत्रालय ने कलकत्ता उच्च न्यायालय से कहा कि वे इस मुकदमे के आवश्यक पक्षकार नहीं हैं और उन्होंने वनाधिकार कानून के तहत उपलब्ध प्रक्रिया अपनाए बिना तथा काफी देरी से अदालत का रुख किया।

वनाधिकार मामले में क्या है केंद्र की दलील

बर्नाबास मंजू, टाइटस, होसी और होपफुल पूर्व आईएएस अधिकारी मीना गुप्ता की जनहित याचिका में पक्षकार बनने की मांग कर रहे हैं। याचिका में उपखंड स्तरीय समिति के गठन, ग्राम सभा के प्रस्तावों और 18 अगस्त 2022 को जारी वनाधिकार प्रमाणपत्र को चुनौती दी गई है। केंद्र का कहना है कि मामले में सरकारी पक्षकार समुदाय के हितों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और जनजातीय परिषद का भी समिति में प्रतिनिधित्व था।

मंत्रालय के अनुसार, कैंपबेल बे, लक्ष्मी नगर और गोविंद नगर की ग्राम सभाएं 12 अगस्त 2022 को हुई थीं और निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया था। इसके विपरीत, आवेदकों का दावा है कि निकोबारी समुदाय की किसी ग्राम सभा ने पैतृक वन भूमि के उपयोग में बदलाव पर विचार नहीं किया। मंजू ने कहा है कि उन्हें 13 अगस्त की बैठक में समिति की सदस्यता के बारे में पता चला और पर्याप्त जानकारी न मिलने के कारण उन्होंने 22 नवंबर को अपना अनापत्ति प्रमाणपत्र वापस ले लिया।

परियोजना और अदालतों में आगे की सुनवाई

विवाद ग्रेट निकोबार में प्रस्तावित 81,000 करोड़ रुपये की परियोजना से जुड़ा है। करीब 166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में प्रस्तावित इस परियोजना में ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, टाउनशिप और ऊर्जा संबंधी ढांचा शामिल हैं। वनाधिकारों की मान्यता और स्थानीय समुदाय की सहमति इस परियोजना से जुड़े प्रमुख सवालों में हैं।

5 अक्टूबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र की कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग स्वीकार नहीं की। न्यायालय ने कहा कि आदिवासी संस्कृति का संरक्षण संविधान के तहत संरक्षित मौलिक अधिकार है। कलकत्ता उच्च न्यायालय में अगली सुनवाई 25 और 26 नवंबर 2026 को निर्धारित है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

:

  • वनाधिकार कानून के तहत अधिकारों की पहचान के लिए ग्राम सभा सिफारिश करती है; इसके बाद उपखंड और जिला स्तर की समितियां प्रस्ताव की जांच और मंजूरी की प्रक्रिया पूरी करती हैं।
  • जांच समितियों में वन, राजस्व और जनजातीय कल्याण विभागों के तीन अधिकारी तथा स्थानीय निकायों के तीन निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं। ये समितियां अपीलों की सुनवाई भी करती हैं।
  • वनवासी अनुसूचित जनजाति के दावेदार को संबंधित क्षेत्र की अनुसूचित जनजाति से होना, 13 दिसंबर 2005 से पहले वहां रहना और आजीविका के लिए वन पर निर्भर होना आवश्यक है।
  • अन्य पारंपरिक वनवासी के लिए वन भूमि पर तीन पीढ़ियों यानी 75 वर्ष के निवास का प्रमाण, 13 दिसंबर 2005 से पहले की अवधि के संदर्भ में, जरूरी है।

इस मामले का फैसला वनाधिकार कानून के तहत ग्राम सभा की भूमिका और विकास परियोजनाओं में स्थानीय समुदायों के अधिकारों के बीच संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा।

Originally written on October 30, 2026 and last modified on October 30, 2026.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *