जीसैट-7बी से सेना की संचार क्षमता को मिलेगी नई मजबूती
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) भारतीय सेना के लिए समर्पित संचार उपग्रह जीसैट-7बी को 2028 के मध्य तक प्रक्षेपित करने की तैयारी में है। इससे सीमावर्ती और दुर्गम क्षेत्रों में तैनात सैनिकों, सैन्य इकाइयों तथा हथियार प्रणालियों को सुरक्षित संचार सुविधा मिलने की उम्मीद है। यह उपग्रह सेना की उपग्रह-आधारित संचार क्षमता को अधिक स्वतंत्र और भरोसेमंद बनाएगा।
दुर्गम मोर्चों तक सुरक्षित संपर्क
जीसैट-7बी को सेना के लिए चौबीसों घंटे संपर्क उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विकसित किया जा रहा है। इसकी मदद से अग्रिम मोर्चों पर तैनात सैनिकों, सैन्य संरचनाओं, हथियार प्रणालियों और हवाई मंचों के बीच संचार संभव होगा। इसकी एक अहम विशेषता ऐसी संचार सुविधा है जिसमें उपयोगकर्ताओं का एक-दूसरे को सीधे देख पाना जरूरी नहीं होता। इसे दृष्टि-रेखा से परे संचार कहा जाता है। उपग्रह के माध्यम से बड़े भूभाग और कठिन भौगोलिक स्थितियों में भी संपर्क बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
फिलहाल भारतीय सेना अपनी उपग्रह-आधारित संचार जरूरतों के लिए भारतीय वायुसेना के जीसैट-7ए पर निर्भर है। सेना के लिए अलग उपग्रह होने से उसकी संचार व्यवस्था को विशेष सैन्य जरूरतों के अनुरूप विकसित किया जा सकेगा। जहां सड़क, दूरसंचार नेटवर्क या अन्य स्थलीय ढांचा बनाना और बनाए रखना कठिन है, वहां उपग्रह संपर्क विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है।
भूस्थिर कक्षा और उपग्रह की विशेषताएं
जीसैट-7बी को पांच टन वजनी भूस्थिर संचार उपग्रह के रूप में तैयार किया जा रहा है। यह भारत का अब तक का सबसे भारी संचार उपग्रह होगा। भूस्थिर उपग्रह पृथ्वी की भूमध्यरेखा के ऊपर लगभग 35,786 किलोमीटर की ऊंचाई पर परिक्रमा करते हैं। उनकी परिक्रमा अवधि पृथ्वी के घूर्णन के बराबर होती है, इसलिए वे जमीन से देखने पर आकाश में एक ही स्थान पर स्थिर दिखाई देते हैं। इससे धरती पर लगे संचार उपकरणों को उपग्रह की बदलती स्थिति का लगातार पीछा नहीं करना पड़ता। इस कक्षा का उपयोग संचार, प्रसारण और मौसम संबंधी सेवाओं में भी किया जाता है।
स्वदेशी निर्माण और परियोजना की समय-सीमा
मार्च 2023 में रक्षा मंत्रालय ने जीसैट-7बी के स्वदेशी डिजाइन, विकास और निर्माण के लिए न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) के साथ 2,963 करोड़ रुपये का अनुबंध किया था। एनएसआईएल इसरो की व्यावसायिक इकाई है। उपग्रह का प्रक्षेपण पहले नवंबर 2027 में प्रस्तावित था, लेकिन तकनीकी मूल्यांकन के कारण इसमें लगभग छह महीने की देरी हुई है। अब इसे 2028 के मध्य तक प्रक्षेपित किए जाने की उम्मीद है।
वायुसेना के लिए जीसैट-7सी भी विकसित किया जा रहा है। 15 अक्टूबर 2026 को इसके लिए 2,563 करोड़ रुपये का अनुबंध अंतिम किया गया। दोनों परियोजनाएं सैन्य संचार के लिए देश की उपग्रह क्षमता को मजबूत करने की दिशा में हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- जीसैट-7बी भारतीय सेना का पहला समर्पित संचार उपग्रह होगा।
- जीसैट-7ए फिलहाल भारतीय सेना की उपग्रह-आधारित संचार जरूरतों में सहायक है।
- न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड, इसरो की व्यावसायिक इकाई है।
- जीसैट-7सी भारतीय वायुसेना के लिए विकसित किया जा रहा है।
जीसैट-7बी से सेना को कठिन इलाकों में संचार के लिए अधिक समर्पित और सुरक्षित व्यवस्था मिलने की संभावना है। इसका स्वदेशी विकास रक्षा क्षेत्र में अंतरिक्ष-आधारित क्षमताओं को आगे बढ़ाने का भी महत्वपूर्ण कदम है।