जीआई-टैग गुलबर्गा तूर दाल को मिला मालदीव बाजार
कर्नाटक की जीआई-टैग्ड गुलबर्गा तूर दाल का निर्यात मालदीव तक पहुंचना राज्य के कृषि उत्पादों के लिए एक अहम उपलब्धि माना जा रहा है। कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) की मदद से 1 मीट्रिक टन की यह खेप 24 सितंबर 2026 को समुद्री मार्ग से रवाना की गई। यह निर्यात किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) आधारित चैनल के जरिए किया गया, जिससे किसानों को बेहतर मूल्य मिलने का रास्ता भी खुला।
गुलबर्गा तूर दाल की पहचान और जीआई दर्जा
गुलबर्गा तूर दाल कर्नाटक के कलबुर्गी क्षेत्र से जुड़ा उत्पाद है। इसे 2019 में भारत की जीआई व्यवस्था के तहत पंजीकरण मिला था। जीआई टैग किसी ऐसे उत्पाद को दिया जाता है जिसकी खास पहचान, गुणवत्ता या प्रतिष्ठा किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी हो। ऐसे उत्पादों को बाजार में अलग पहचान मिलती है और उनकी ब्रांड वैल्यू बढ़ती है।
निर्यात चैनल और किसानों को मिला लाभ
इस खेप का संचालन मैसूरु स्थित M/s Silken Global Exports and Imports ने अपने एफपीओ-आधारित ब्रांड के जरिए किया। इस निर्यात-लिंक्ड चैनल के तहत किसानों को 82 रुपये प्रति किलोग्राम का मूल्य मिला, जबकि उस समय बाजार में प्रचलित कीमत लगभग 60 रुपये प्रति किलोग्राम थी। इससे साफ है कि संगठित निर्यात व्यवस्था किसानों के लिए बेहतर दाम और स्थिर मांग दोनों सुनिश्चित कर सकती है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह निर्यात
मालदीव जैसे द्वीपीय बाजारों तक समुद्री मार्ग से कृषि उत्पाद भेजना व्यावहारिक और लागत-प्रभावी विकल्प माना जाता है। ऐसे बाजारों में नियमित आपूर्ति होने पर कर्नाटक के उत्पादकों और निर्यातकों के लिए लगातार मांग बन सकती है। यह पहल केवल एक खेप तक सीमित नहीं है, बल्कि जीआई-टैग्ड कृषि उत्पादों के लिए विदेशी बाजारों में नई संभावनाओं का संकेत भी देती है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- एपीडा, वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अधीन एक वैधानिक निकाय है।
- भारत में जीआई पंजीकरण Geographical Indications of Goods (Registration and Protection) Act, 1999 के तहत होता है।
- एफपीओ यानी किसान उत्पादक संगठन किसानों की सामूहिक इकाई होती है, जिसका उद्देश्य बाजार तक बेहतर पहुंच दिलाना है।
- जीआई टैग वाले कृषि उत्पादों में मसाले, दालें, फल और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ शामिल हो सकते हैं।
गुलबर्गा तूर दाल का यह निर्यात कर्नाटक के कृषि उत्पादों की ब्रांडिंग, मूल्य संवर्धन और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच का अच्छा उदाहरण है। यदि ऐसे निर्यात चैनल नियमित रूप से विकसित होते हैं, तो स्थानीय किसानों को लंबे समय तक लाभ मिल सकता है।