कबाड़ से कमाल: क्या है व्हीकल स्क्रैपिंग पॉलिसी और यह पर्यावरण के लिए क्यों है संजीवनी?

कबाड़ से कमाल: क्या है व्हीकल स्क्रैपिंग पॉलिसी और यह पर्यावरण के लिए क्यों है संजीवनी?

सड़कों पर दौड़ती एक चमचमाती नई कार को देखकर हर किसी का मन खुश हो जाता है, लेकिन क्या आपने कभी उस पुरानी खटारा गाड़ी पर गौर किया है जो पीछे काले धुएं का गुबार छोड़ते हुए रेंगती रहती है? भारत की सड़कों पर ऐसे लाखों वाहन हैं जो अपनी उम्र पूरी कर चुके हैं, लेकिन फिर भी किसी तरह घिसट रहे हैं। ये गाड़ियां न सिर्फ सड़क सुरक्षा के लिए खतरा हैं, बल्कि हमारे फेफड़ों में ज़हर घोलने का सबसे बड़ा जरिया भी हैं। इसी समस्या से निपटने के लिए भारत सरकार ‘व्हीकल स्क्रैपिंग पॉलिसी’ (Vehicle Scrappage Policy) लेकर आई है। इसे आप सीधे शब्दों में ‘गाड़ियों को कबाड़ में बदलने की सरकारी नीति’ कह सकते हैं। यह कोई आम प्रशासनिक फैसला नहीं है, बल्कि देश की हवा को साफ करने, सड़कों को सुरक्षित बनाने और ऑटोमोबाइल सेक्टर में एक नई क्रांति लाने की दिशा में उठाया गया एक बहुत बड़ा रणनीतिक कदम है।

उम्र का पैमाना: कब कबाड़ बन जाती है आपकी गाड़ी?

इस पॉलिसी के तहत किसी भी गाड़ी को सिर्फ इस आधार पर कबाड़ घोषित नहीं किया जाता कि वह पुरानी हो चुकी है, बल्कि इसके लिए बकायदा कानूनन उम्र और फिटनेस के कड़े पैमाने तय किए गए हैं। नीति के अनुसार वाहनों को तीन अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है। सरकारी वाहनों के लिए नियम सबसे सख्त हैं। केंद्र और राज्य सरकारों, नगर निगमों और सरकारी परिवहन निगमों के सभी वाहन जो 15 साल से अधिक पुराने हो चुके हैं, उन्हें अनिवार्य रूप से सड़कों से हटाकर पंजीकृत स्क्रैपिंग केंद्रों (RVSF) में कबाड़ के लिए भेजना तय किया गया है। व्यावसायिक वाहनों जैसे ट्रक, बस और टैक्सियों के लिए भी 15 साल की सीमा तय है। 15 साल पूरे होने के बाद इन गाड़ियों का किसी भी सामान्य केंद्र पर नहीं, बल्कि सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त ‘ऑटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन’ (ATS) पर फिटनेस टेस्ट होना अनिवार्य है। अगर ये गाड़ियां फिटनेस टेस्ट पास नहीं कर पातीं, तो इन्हें ‘एंड ऑफ लाइफ व्हीकल’ (ELV) यानी जीवन चक्र समाप्त कर चुका वाहन मान लिया जाता है और इनका रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया जाता है। आपके और हमारे जैसे आम लोगों की प्राइवेट गाड़ियों (जैसे व्यक्तिगत कार या बाइक) के लिए यह समयसीमा 20 साल तय की गई है। 20 साल पूरे होने पर इन निजी वाहनों को भी फिटनेस टेस्ट से गुजरना होगा। हालांकि दिल्ली-एनसीआर जैसे क्षेत्रों में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के विशेष आदेश के तहत 10 साल पुरानी डीजल और 15 साल पुरानी पेट्रोल गाड़ियों पर पहले से ही पाबंदी लागू है।

उम्र का पैमाना: कब कबाड़ बन जाती है आपकी गाड़ी?

पर्यावरण के लिए क्यों जीवनदान है यह पॉलिसी?

इस पॉलिसी को लाने का सबसे बड़ा और प्राथमिक मकसद पर्यावरण को बचाना है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक पुराना और अनफिट वाहन नए आधुनिक वाहनों (जैसे BS6 मानक वाले वाहन) की तुलना में 10 से 12 गुना अधिक प्रदूषण फैलाता है। ये पुरानी गाड़ियां हवा में खतरनाक पार्टिकुलेट मैटर (PM 2.5), कार्बन मोनोऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी जहरीली गैसें भारी मात्रा में छोड़ती हैं। जब ये खटारा गाड़ियां सड़कों से हटेंगी, तो शहरों की वायु गुणवत्ता में अभूतपूर्व सुधार देखने को मिलेगा। इसके अलावा, पुराने वाहनों में ईंधन की खपत बहुत ज्यादा होती है क्योंकि उनका इंजन कमजोर हो चुका होता है। नए और कुशल वाहनों के बाजार में आने से देश के तेल आयात के बिल में भी भारी कमी आएगी, जिसका सीधा फायदा देश की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण दोनों को होगा। पर्यावरण को दूसरा बड़ा फायदा मिलता है ‘सर्कुलर इकॉनमी’ और रीसाइक्लिंग से। जब एक गाड़ी को अधिकृत स्क्रैपिंग सेंटर में वैज्ञानिक तरीके से काटा जाता है, तो उससे भारी मात्रा में स्टील, एल्युमीनियम, तांबा, रबर और प्लास्टिक जैसी चीजें निकलती हैं। इन धातुओं को दोबारा रीसायकल करके नई गाड़ियां बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे नए कच्चे माल के खनन की जरूरत कम होती है, जिससे जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव घटता है।

पर्यावरण के लिए क्यों जीवनदान है यह पॉलिसी?

गाड़ी कबाड़ में देने पर मालिक को क्या मिलेगा?

सरकार भी जानती है कि कोई भी व्यक्ति अपनी चलती हुई गाड़ी को आसानी से कबाड़ में नहीं देना चाहेगा। इसीलिए इस नीति में गाड़ी मालिकों के लिए आकर्षक वित्तीय प्रोत्साहनों (Incentives) की व्यवस्था की गई है, ताकि लोग खुद आगे आकर अपनी पुरानी गाड़ियों को स्क्रैप कराएं। जब आप अपनी पुरानी गाड़ी को अधिकृत स्क्रैपिंग सेंटर पर सौंपते हैं, तो आपको वहां से एक बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेज मिलता है, जिसे ‘सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट’ (CD) कहा जाता है। यह सर्टिफिकेट आपके लिए किसी जैकपॉट से कम नहीं है क्योंकि इसके जरिए नई गाड़ी खरीदते समय आपको कई बड़े फायदे मिलते हैं। सबसे पहले, स्क्रैपिंग सेंटर आपको आपकी पुरानी गाड़ी में मौजूद धातुओं के वजन के आधार पर ‘स्क्रैप वैल्यू’ देता है। यह रकम आम तौर पर नई गाड़ी के एक्स-शोरूम कीमत की 4% से 6% के बराबर होती है। उदाहरण के लिए, एक पुरानी छोटी कार के लिए आपको ₹15,000 से ₹30,000 तक और बड़ी एसयूवी के लिए इससे भी कहीं अधिक मिल सकते हैं। इसके बाद, जब आप इस सर्टिफिकेट को दिखाकर नई गाड़ी खरीदने शोरूम जाएंगे, तो वाहन निर्माता कंपनियां आपको नई गाड़ी की एक्स-शोरूम कीमत पर सीधे 5% तक का डिस्काउंट देती हैं। इतना ही नहीं, राज्य सरकारों ने भी इस नीति को बढ़ावा देने के लिए नई गाड़ियों के रोड टैक्स में भारी छूट देने का फैसला किया है। निजी वाहनों के लिए यह छूट 25% तक और कमर्शियल वाहनों के लिए 15% तक हो सकती है। आखिरी और सबसे बड़ा फायदा यह है कि नई गाड़ी के रजिस्ट्रेशन के समय लगने वाली पूरी फीस माफ कर दी जाती है।

कैसे काम करता है फिटनेस टेस्ट का चक्रव्यूह?

कई लोगों के मन में यह डर रहता है कि क्या 20 साल होते ही उनकी गाड़ी जबरन छीन ली जाएगी? ऐसा बिल्कुल नहीं है। यदि आपकी गाड़ी अच्छी स्थिति में है और प्रदूषण के मानकों को पूरा करती है, तो आप उसे आगे भी चला सकते हैं। लेकिन इसके लिए उसे ‘ऑटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन’ (ATS) के कड़े इम्तिहान को पास करना होगा। इस टेस्ट में इंसानी दखल बहुत कम होता है ताकि भ्रष्टाचार की गुंजाइश न रहे। कंप्यूटरीकृत मशीनें गाड़ी के ब्रेक की क्षमता, हेडलाइट का एलाइनमेंट, सस्पेंशन की मजबूती, इंजन से निकलने वाले धुएं का स्तर और स्पीडोमीटर की सटीकता की गहराई से जांच करती हैं। अगर गाड़ी पहली बार में फेल हो जाती है, तो मालिक को उसे ठीक कराने और दोबारा टेस्ट (Retest) कराने का मौका दिया जाता है। लेकिन अगर गाड़ी बार-बार फेल होती है, तो उसे ‘VAHAN’ डेटाबेस पर ब्लैकलिस्ट कर दिया जाता है। इसके बाद न तो उस गाड़ी का बीमा (Insurance) रीन्यू हो सकता है और न ही उसे कानूनी रूप से किसी दूसरे के नाम ट्रांसफर किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में उसे कबाड़ में बेचना ही एकमात्र कानूनी विकल्प बचता है।

देश के ऑटोमोबाइल बाजार पर इसका असर

यह पॉलिसी सिर्फ पर्यावरण और ग्राहक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के लिए एक बूस्टर डोज की तरह काम कर रही है। जब सड़कों से लाखों पुरानी गाड़ियां हटेंगी, तो बाजार में नई गाड़ियों की मांग में जबरदस्त उछाल आएगा। इससे वाहन निर्माता कंपनियों का उत्पादन बढ़ेगा और इस पूरे इकोसिस्टम में रोजगार के लाखों नए अवसर पैदा होंगे। देशभर में सैकड़ों की संख्या में आधुनिक रजिस्टर्ड व्हीकल स्क्रैपिंग फैसिलिटीज (RVSF) और ऑटोमेटेड टेस्टिंग सेंटर्स खुल रहे हैं। इन सेंटर्स में वैज्ञानिक तरीके से गाड़ियों के खतरनाक रसायनों (जैसे इंजन ऑयल, कूलेंट और बैटरी एसिड) को सुरक्षित रूप से निपटाया जाता है, जिससे जमीन और भूमिगत जल प्रदूषित होने से बच जाता है। यह अनौपचारिक कबाड़ बाजारों (जैसे दिल्ली का मायापुरी) को एक व्यवस्थित, सुरक्षित और कॉर्पोरेट उद्योग में बदलने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।

Originally written on July 14, 2026 and last modified on July 14, 2026.

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