ई-कॉमर्स की दुनिया में भारत का नया हथियार: क्या है ONDC और यह कैसे काम करता है?
भारत में जब भी ऑनलाइन शॉपिंग की बात होती है, तो हमारे दिमाग में सबसे पहले अमेज़न, फ्लिपकार्ट, मिंत्रा या फिर खाना ऑर्डर करने के लिए जोमैटो और स्विगी जैसे नाम आते हैं। इन बड़ी कंपनियों ने हमारे सामान खरीदने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप इन प्लेटफॉर्म से कुछ खरीदते हैं, तो पर्दे के पीछे का खेल क्या होता है? इन बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का बाजार पर लगभग एकाधिकार (Monopoly) है। एक छोटा दुकानदार या रेस्टोरेंट मालिक अगर ऑनलाइन अपना सामान बेचना चाहता है, तो उसे इन कंपनियों को 20 से 30 परसेंट तक का भारी-भरकम कमीशन देना पड़ता है। इस वजह से या तो छोटे दुकानदारों का मुनाफा खत्म हो जाता है या फिर ग्राहकों को चीजें महंगी मिलती हैं। इसी डिजिटल दादागिरी को खत्म करने के लिए भारत सरकार ने एक ऐसा हथियार तैयार किया है, जिसे ONDC यानी ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स कहा जाता है। इसे भारत के ई-कॉमर्स सेक्टर का ‘UPI मोमेंट’ माना जा रहा है।
डिजिटल दुनिया का नया हाईवे: ओएनडीसी क्या है?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ONDC कोई ऐप नहीं है जिसे आप प्ले स्टोर से डाउनलोड कर सकें। जैसे अमेज़न या जोमैटो एक ऐप हैं, ONDC वैसा बिल्कुल नहीं है। यह असल में एक ‘प्रोटोकॉल’ या एक डिजिटल नेटवर्क है, जो अलग-अलग खरीदारों, विक्रेताओं और डिलीवरी कंपनियों को एक जगह जोड़ने का काम करता है। इसे समझने का सबसे आसान तरीका है यूपीआई (UPI)। जब आप किसी दुकान पर क्यूआर कोड स्कैन करके पैसे भेजते हैं, तो यह मायने नहीं रखता कि आपके पास पेटीएम है, फोनपे है या गूगल पे। यूपीआई के जरिए सारे बैंक और ऐप्स आपस में जुड़े हुए हैं। ठीक इसी तरह, ONDC शॉपिंग की दुनिया में काम करता है। यह एक ऐसी डिजिटल सड़क है जिस पर कोई भी दुकान अपनी दुकान खोल सकती है और कोई भी ग्राहक किसी भी ऐप से वहां तक पहुंच सकता है।

प्लेटफॉर्म और ओपन नेटवर्क का असली अंतर
पारंपरिक ई-कॉमर्स कंपनियां ‘प्लेटफॉर्म-केंद्रित’ (Platform-Centric) मॉडल पर काम करती हैं। इसका मतलब यह है कि अगर आपको अमेज़न पर सामान बेचना है, तो आपको अमेज़न के ऐप पर ही रजिस्टर करना होगा। ग्राहक भी अमेज़न के ऐप पर ही आएगा। पेमेंट और डिलीवरी का जिम्मा भी उसी कंपनी का होगा। यानी पूरी चाबी एक ही कंपनी के हाथ में होती है। इसके उलट, ONDC एक ‘ओपन नेटवर्क’ (Open Network) है। यहां पूरा सिस्टम टुकड़ों में बंटा हुआ है, जिसे अनबंडलिंग (Unbundling) कहते हैं।
- बायर ऐप (Buyer App): वह ऐप जिसका इस्तेमाल ग्राहक सामान ढूंढने और खरीदने के लिए करता है (जैसे पेटीएम, मैजिकपिन, स्नैपडील)।
- सेलर ऐप (Seller App): वह ऐप या सॉफ्टवेयर जिसके जरिए एक छोटा दुकानदार या रेस्टोरेंट अपने प्रोडक्ट्स को ऑनलाइन लिस्ट करता है।
- लॉजिस्टिक्स पार्टनर (Logistics Partner): वह कूरियर या डिलीवरी कंपनी जो सामान को दुकानदार से उठाकर ग्राहक तक पहुंचाती है (जैसे डंज़ो, शैडोफैक्स, ऑलकार्गो गति)।
अब जादू देखिए: मान लीजिए एक रेस्टोरेंट मालिक ने खुद को किसी सेलर ऐप के जरिए ONDC नेटवर्क पर रजिस्टर कर लिया। अब उसका मेन्यू किसी एक ऐप तक सीमित नहीं रहेगा। कोई भी ग्राहक जब अपने पेटीएम या मैजिकपिन ऐप पर जाकर खाना सर्च करेगा, तो उसे उस रेस्टोरेंट का खाना दिखने लगेगा। ऑर्डर पेटीएम से आएगा, रेस्टोरेंट उसे तैयार करेगा, और डंज़ो का राइडर उसे डिलीवर कर देगा। इस पूरे खेल में किसी एक कंपनी की तानाशाही नहीं चलती।

छोटे दुकानदारों और ग्राहकों का असली फायदा
भारत में लगभग 1.4 करोड़ किराना दुकानें हैं, लेकिन इनमें से बेहद कम दुकानें ही डिजिटल मार्केट का हिस्सा बन पाई हैं। बड़ी कंपनियों के ऊंचे कमीशन और सख्त नियमों के कारण छोटे व्यापारी ऑनलाइन आने से डरते हैं। ONDC इस दूरी को पाटने का काम कर रहा है। सैलर्स के लिए सबसे बड़ा फायदा यह है कि उन्हें भारी कमीशन से आजादी मिल जाती है। जहां पारंपरिक फूड डिलीवरी ऐप्स रेस्टोरेंट से भारी कमीशन वसूलते हैं, वहीं ONDC नेटवर्क पर यह कमीशन बेहद कम (लगभग 3 से 5 परसेंट) होता है। इसके अलावा, व्यापारियों का अपना डेटा उनके पास सुरक्षित रहता है, जिससे उन्हें भविष्य में बिजनेस लोन लेने में आसानी होती है। सरकार ने इसके लिए बकायदा ‘टीम’ (TEAM – MSME Trade Enablement and Marketing) जैसी पहल शुरू की है, जिसका मकसद लाखों छोटे उद्योगों और महिला उद्यमियों को इस नेटवर्क से जोड़ना है। ग्राहकों के लिहाज से देखें तो जब दुकानदार को कम कमीशन देना पड़ता है, तो वह अपने प्रोडक्ट्स की कीमत कम रख सकता है। कई बार देखा गया है कि जोमैटो या स्विगी पर जो खाना 300 रुपये का मिल रहा होता है, वही खाना ओएनडीसी समर्थित ऐप्स पर 250 रुपये या उससे भी कम में मिल जाता है। इसके अलावा ग्राहकों के पास विकल्पों की भरमार होती है। वे एक ही जगह पर स्थानीय किराना दुकान से लेकर बड़े ब्रांड्स तक के दामों की तुलना कर सकते हैं।
किराना दुकानों के लिए ‘डिजिटल दुकान’ का मास्टरस्ट्रोक
देश के करोड़ों किराना स्टोरों को इस नेटवर्क से सीधे जोड़ने के लिए ‘डिजीदुकान’ (DigiDukaan) नाम की एक बेहद महत्वाकांक्षी मुहिम चलाई जा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य किराना दुकानदारों के लिए बी2बी (Business-to-Business) यानी थोक खरीद की प्रक्रिया को डिजिटल और आसान बनाना है। आमतौर पर एक छोटा किराना दुकानदार अलग-अलग कंपनियों के डिस्ट्रीब्यूटर्स के चक्कर काटता है, जिससे उसका काफी समय और पैसा बर्बाद होता है। डिजीदुकान के जरिए ये दुकानदार सीधे बड़ी एफएमसीजी (FMCG) कंपनियों और बड़े वितरकों से जुड़ सकते हैं। इससे उन्हें कंपनियों की नई स्कीम्स, डिस्काउंट और सामान की उपलब्धता की सीधी जानकारी मिलती है। हैदराबाद और जयपुर जैसे शहरों से शुरू हुई यह तकनीक अब मुंबई, बेंगलुरु और दिल्ली-एनसीआर जैसे बड़े महानगरों में तेजी से फैल रही है, जो पारंपरिक भारतीय रिटेल सेक्टर की पूरी तस्वीर बदल रही है।
सिर्फ शॉपिंग नहीं, मेट्रो टिकट से लेकर सरकारी लोन तक
ONDC का दायरा सिर्फ दाल-चावल, कपड़े या रेस्टोरेंट के खाने तक सीमित नहीं रहा है। यह नेटवर्क अब भारतीय नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी के हर हिस्से में एंट्री कर रहा है। कोच्चि, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहरों में ‘नम्मा यात्री’ और ‘यात्री साथी’ जैसे ऐप्स ओएनडीसी के जरिए ही मोबिलिटी (ऑटो और कैब बुकिंग) की सर्विस दे रहे हैं, जहां ड्राइवरों से कोई कमीशन नहीं लिया जाता। इतना ही नहीं, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने देश के 170 से ज्यादा ऐतिहासिक स्मारकों और म्यूजियमों की ऑनलाइन टिकट बुकिंग को भी ओएनडीसी नेटवर्क से जोड़ दिया है। यानी अब आप किसी भी ओएनडीसी समर्थित ऐप से ताजमहल या लाल किले की टिकट बुक कर सकते हैं। इसके अलावा, बैंकिंग और फाइनेंस के क्षेत्र में भी यह नेटवर्क बड़ा धमाका कर चुका है। अब इस प्लेटफॉर्म के जरिए महज 6 मिनट के अंदर पूरी तरह से डिजिटल और पेपरलेस लोन की सुविधा दी जा रही है, जहां देश के बड़े सरकारी और प्राइवेट बैंक ग्राहकों को सीधे क्रेडिट और इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स ऑफर कर रहे हैं।
ओएनडीसी से जुड़े कुछ दिलचस्प और अनसुने फैक्ट्स
- नॉट-फॉर-प्रॉफिट मॉडल: ओएनडीसी कोई प्राइवेट कंपनी नहीं है। इसे कंपनी एक्ट के सेक्शन 8 के तहत एक गैर-लाभकारी (Not-for-profit) संस्था के रूप में रजिस्टर किया गया है, जिसे सरकार के डीपीआईआईटी (DPIIT) विभाग की देखरेख में चलाया जाता है।
- महालक्ष्मी और महाकुंभ का प्रसाद: इस नेटवर्क की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि महाकुंभ के दौरान देश के कोने-कोने में बैठे श्रद्धालुओं तक अयोध्या और प्रयागराज के बड़े मंदिरों का प्रामाणिक प्रसाद इसी नेटवर्क के जरिए सुरक्षित पहुंचाया गया।
- दिग्गजों का निवेश: भारत के सबसे बड़े वित्तीय संस्थानों जैसे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI), पंजाब नेशनल बैंक (PNB), बैंक ऑफ बड़ौदा और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) ने इस नेटवर्क को खड़ा करने के लिए भारी निवेश किया है।
- भाषीनी और ‘सारथी’ का साथ: भारत के सुदूर गांवों के व्यापारी जो अंग्रेजी नहीं जानते, उनके लिए ओएनडीसी ने एआई-आधारित अनुवाद टूल ‘भाषीनी’ की मदद से ‘सारथी’ ऐप तैयार किया है। इसमें लोग अपनी स्थानीय भाषा में बोलकर ऑर्डर और इन्वेंट्री मैनेज कर सकते हैं।
ई-कॉमर्स के इस विशाल समंदर में ओएनडीसी अभी अपनी जड़ें मजबूत कर रहा है। हालांकि अमेज़न और फ्लिपकार्ट जैसी स्थापित कंपनियों के मुकाबले इसकी लॉजिस्टिक्स और कस्टमर केयर सर्विस को और बेहतर बनाने की चुनौतियां अभी भी सामने हैं। लेकिन जिस रफ्तार से हर महीने करोड़ों ट्रांजैक्शंस इस नेटवर्क पर हो रहे हैं, उसने यह साफ कर दिया है कि आने वाले समय में भारत का ऑनलाइन शॉपिंग मार्केट किसी एक या दो विदेशी कंपनियों की जागीर नहीं रहेगा, बल्कि इसमें देश के हर छोटे-बड़े दुकानदार की बराबर की हिस्सेदारी होगी।