ईरान में विदेशी मीडिया से बातचीत पर कड़ा कानून प्रस्तावित

ईरान में विदेशी मीडिया से बातचीत पर कड़ा कानून प्रस्तावित

ईरान की संसद ने 16 अगस्त 2026 को एक विधेयक के सामान्य ढांचे को मंजूरी दी, जिसका उद्देश्य शत्रुतापूर्ण माने जाने वाले मीडिया संस्थानों से इंटरव्यू, चर्चा और अन्य संचार को आपराधिक दायरे में लाना है। प्रस्ताव खास तौर पर अमेरिकी और इजरायली मीडिया आउटलेट्स, उनके वित्तपोषित संस्थानों और कुछ अन्य विदेशी पक्षों के साथ संपर्क पर नियंत्रण बढ़ाने की दिशा में है। यह कदम ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा, सूचना नियंत्रण और बाहरी प्रभाव से जुड़ी उसकी सख्त नीति को फिर से सामने लाता है।

विधेयक में क्या-क्या प्रावधान हैं

प्रस्तावित कानून के तहत शत्रुतापूर्ण मीडिया प्लेटफॉर्म के साथ बातचीत करने वालों को छह महीने से दो साल तक की जेल हो सकती है। गैर-शत्रुतापूर्ण विदेशी मीडिया को इंटरव्यू देने से पहले खुफिया मंत्रालय को सूचना देना अनिवार्य होगा। इसके अलावा, विदेश मंत्रालय की लिखित अनुमति के बिना विदेशी दूतावासों या संगठनों से संपर्क करने पर जुर्माना और कुछ सामाजिक अधिकारों की हानि का प्रावधान भी रखा गया है।

विधेयक वैज्ञानिक सहयोग को भी सीमित करने की बात करता है। इसके अनुसार, बिना मंजूरी वाले विदेशी संस्थानों के साथ शोध या अकादमिक सहयोग पर रोक लग सकती है। विदेशी व्यक्तियों के साथ जानकारी साझा करने के लिए भी खुफिया मंत्रालय की सहमति आवश्यक बताई गई है।

राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अपराधों पर सख्ती

इस विधेयक में विदेशी खुफिया सेवाओं के निर्देश पर तैयार की गई नीतियों या विधायी प्रस्तावों के लिए 30 साल तक की सजा का प्रावधान भी शामिल है, यदि उनसे ईरान की सुरक्षा या स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचता हो। ऐसे मामलों की सुनवाई रिवोल्यूशनरी कोर्ट्स में होगी, जो ईरान में सुरक्षा और राजनीतिक मामलों की विशेष अदालतें हैं। आर्थिक अपराधों में भी, यदि विदेशी निगरानी या निर्देशन का तत्व पाया जाता है, तो सजा बढ़ाने की बात कही गई है।

संसदीय न्यायिक आयोग के सदस्य उस्मान सलारी ने कहा है कि ये प्रावधान अभी अंतिम नहीं हैं और संसद में इन पर आगे बहस होगी। यानी फिलहाल यह विधेयक कानून नहीं बना है, बल्कि विधायी प्रक्रिया के शुरुआती चरण में है।

पृष्ठभूमि और आगे की प्रक्रिया

यह प्रस्ताव 2025 में पारित उस कानून से जुड़ा माना जा रहा है, जो इजरायल के साथ 12 दिन के युद्ध के बाद लाया गया था। उस कानून में शत्रु देशों के साथ सहयोग पर दंड बढ़ाए गए थे और राष्ट्रीय सुरक्षा अपराधों के लिए ईरान की कानूनी व्यवस्था को और कड़ा किया गया था। नया विधेयक उसी दिशा में एक और कदम है, जिसमें विदेशी मीडिया, संस्थानों और संपर्कों पर अधिक निगरानी की कोशिश दिखती है।

अब इस विधेयक को ईरान की गार्जियन काउंसिल की समीक्षा से गुजरना होगा। यह 12 सदस्यीय संवैधानिक निकाय है, जो किसी भी कानून की संविधान और इस्लामी कानून से संगति की जांच करता है। इसकी मंजूरी के बाद ही विधेयक कानून का रूप ले सकेगा।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • ईरान की संसद को इस्लामिक कंसल्टेटिव असेंबली कहा जाता है।
  • गार्जियन काउंसिल में 12 सदस्य होते हैं; 6 धर्मगुरु सुप्रीम लीडर नियुक्त करते हैं और 6 न्यायविद न्यायपालिका की सिफारिश पर आते हैं।
  • रिवोल्यूशनरी कोर्ट्स की स्थापना 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद हुई थी।
  • ईरान का खुफिया मंत्रालय आधिकारिक रूप से Ministry of Intelligence and Security कहलाता है।

यह विधेयक ईरान की उस व्यापक नीति का हिस्सा दिखता है, जिसमें बाहरी प्रभाव, सूचना प्रवाह और सुरक्षा से जुड़े हर संपर्क पर कड़ा नियंत्रण रखा जाता है। अब नजर इस पर रहेगी कि संसद और गार्जियन काउंसिल की आगे की प्रक्रिया में यह प्रस्ताव किस रूप में अंतिम होता है।

Originally written on August 16, 2026 and last modified on August 16, 2026.

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