आरबीआई की फॉरेक्स स्वैप योजना से विदेशी पूंजी प्रवाह को मजबूती
भारतीय रिजर्व बैंक की रियायती फॉरेक्स स्वैप सुविधा ने विदेशी पूंजी आकर्षित करने में तेज़ असर दिखाया है। 17 जुलाई 2026 तक इस योजना के तहत 20.7 अरब डॉलर से अधिक, यानी लगभग 2 लाख करोड़ रुपये का विदेशी मुद्रा प्रवाह दर्ज किया गया। यह सुविधा भारत के भुगतान संतुलन को सहारा देने और विदेशी पूंजी को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी।
योजना कैसे काम करती है
फॉरेक्स स्वैप सुविधा एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें केंद्रीय बैंक कुछ पात्र विदेशी मुद्रा देनदारियों पर स्वैप कवर उपलब्ध कराता है। इस मामले में आरबीआई ने कुछ खास प्रवाहों पर हेजिंग लागत का पूरा बोझ उठाया, जिससे बैंकों और जमाकर्ताओं के लिए विदेशी मुद्रा जुटाना सस्ता हो गया। यही कारण है कि यह योजना विदेशी मुद्रा जमा और उधारी दोनों के लिए आकर्षक बनी।
कहां से आया सबसे ज्यादा पैसा
इस सुविधा के तहत सबसे बड़ा हिस्सा विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) जमा यानी FCNR(B) से आया। 17 जुलाई 2026 तक इन जमाओं से 17.406 अरब डॉलर जुटाए गए। इसके अलावा ओवरसीज फॉरेन करेंसी बॉरोइंग्स से 1.97 अरब डॉलर और एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग्स से 1.342 अरब डॉलर का प्रवाह दर्ज हुआ।आरबीआई FCNR(B) जमाओं पर लगभग 280 से 300 बेसिस प्वाइंट प्रति वर्ष की हेजिंग लागत वहन कर रहा है। इसी वजह से बैंकों को डॉलर जमा पर 5.5% से 7.1% तक की दरें देने की सुविधा मिली, जबकि पहले यह दायरा लगभग 2% से 4% था।
कब तक लागू रहेगी सुविधा
FCNR(B) जमाओं के लिए रियायती स्वैप सुविधा 30 सितंबर 2026 तक उपलब्ध रहेगी। वहीं ओवरसीज फॉरेन करेंसी बॉरोइंग्स और एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग्स के लिए यह सुविधा 31 दिसंबर 2026 तक जारी रहेगी। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह स्वैप सुविधा केवल मूलधन को कवर करती है, ब्याज घटक को नहीं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- FCNR(B) का पूरा नाम Foreign Currency Non-Resident (Bank) deposits है, यानी अनिवासी भारतीयों की विदेशी मुद्रा में रखी गई जमा।
- External Commercial Borrowings (ECB) वे ऋण हैं जो पात्र भारतीय संस्थाएं गैर-निवासी उधारदाताओं से लेती हैं।
- Basis points वित्तीय दरों में बदलाव मापने की इकाई है; 100 बेसिस प्वाइंट = 1 प्रतिशत अंक।
- 2013 में भी आरबीआई की ऐसी ही स्वैप व्यवस्था ने लगभग 26 अरब डॉलर भारतीय बैंकों में आकर्षित किए थे।
यह मौजूदा पहल 2013 की व्यवस्था से संरचनात्मक रूप से मिलती-जुलती है और इसका उद्देश्य बाहरी क्षेत्र की स्थिरता बनाए रखते हुए विदेशी मुद्रा प्रवाह को बढ़ाना है। बढ़ती भागीदारी यह संकेत देती है कि अनुकूल शर्तें मिलने पर विदेशी मुद्रा जमा और उधारी के जरिए भारत में पूंजी आकर्षित की जा सकती है।