आईआईटी तिरुपति में ब्रिक्स भू-स्थानिक सहयोग को नई गति
आईआईटी तिरुपति ने 20 से 22 जुलाई 2026 तक अपने येरपेडु परिसर में ब्रिक्स वर्किंग ग्रुप ऑन जियोस्पेशियल टेक्नोलॉजीज एंड इट्स एप्लिकेशंस की पांचवीं बैठक की मेजबानी की। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के तहत आयोजित इस तीन दिवसीय बैठक में ब्रिक्स देशों के साथ-साथ साझेदार देशों के प्रतिनिधि हाइब्रिड मोड में शामिल हुए। यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब भू-स्थानिक तकनीकें नीति-निर्माण, आपदा प्रबंधन, शहरी नियोजन और पर्यावरण निगरानी जैसे क्षेत्रों में तेजी से महत्वपूर्ण होती जा रही हैं।
भू-स्थानिक तकनीक क्यों अहम हैं
भू-स्थानिक तकनीकें स्थान-आधारित डेटा के संग्रह, विश्लेषण और उपयोग से जुड़ी होती हैं। इनमें रिमोट सेंसिंग, ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम, जियोग्राफिक इन्फॉर्मेशन सिस्टम और डिजिटल मैपिंग जैसी प्रणालियां शामिल हैं। इनका उपयोग केवल नक्शे बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इनके जरिए कृषि, परिवहन, शहरी सेवाओं, जलवायु अनुकूलन और आपदा जोखिम घटाने जैसे क्षेत्रों में बेहतर निर्णय लिए जाते हैं।
बैठक में किन मुद्दों पर चर्चा हुई
इस बैठक का फोकस सतत विकास के लिए भू-स्थानिक अवसंरचना, जलवायु सहनशीलता, पोजिशनिंग-नेविगेशन-टाइमिंग तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित भू-स्थानिक विश्लेषण और डेटा इंटरऑपरेबिलिटी पर रहा। इन विषयों का सीधा संबंध आधुनिक डिजिटल शासन और वैज्ञानिक सहयोग से है। खास बात यह रही कि अलग-अलग देशों के सिस्टम और डेटा प्लेटफॉर्म के बीच बेहतर तालमेल कैसे बने, इस पर भी विचार किया गया। उद्घाटन सत्र में आईआईटी तिरुपति के निदेशक के. एन. सत्यनारायण, डीएसटी के उप सचिव गौतम गोविंद, राष्ट्रीय भू-स्थानिक कार्यक्रम प्रभाग के प्रमुख मनोरंजन मोहंती, तथा वैज्ञानिक शुभा पांडे और अरिंदम भट्टाचार्य मौजूद रहे। आयोजन में आईआईटी तिरुपति की नवविश्कार आई-हब फाउंडेशन, यानी IITNiF, ने भी भूमिका निभाई।
ब्रिक्स और भू-स्थानिक सहयोग का व्यापक संदर्भ
ब्रिक्स समूह में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं। यह मंच विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए लगातार काम कर रहा है। भू-स्थानिक तकनीकों पर यह बैठक इसी सहयोग को व्यावहारिक दिशा देने का प्रयास है। ऐसे मंचों से न केवल शोध संस्थानों के बीच समन्वय बढ़ता है, बल्कि नीति-स्तर पर भी साझा ढांचे तैयार करने में मदद मिलती है। बैठक से तिरुपति सिफारिशें (2026), ब्रिक्स वर्किंग ग्रुप एक्शन प्लान (2026–2027), ब्रिक्स जियोडेसी एंड पोजिशनिंग कोऑपरेशन फ्रेमवर्क और ब्रिक्स फ्रेमवर्क फॉर इंटरऑपरेबल जियोस्पेशियल डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे दस्तावेज सामने आने की उम्मीद है। तकनीकी सत्रों में उभरती तकनीकों को भू-स्थानिक प्रणालियों से जोड़ने और “Translating Innovation into Impact” विषय पर विशेष सत्र भी शामिल है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- GIS एक कंप्यूटर-आधारित प्रणाली है, जिसका उपयोग स्थानिक डेटा को संग्रहित, विश्लेषित और प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है।
- GNSS में GPS, GLONASS, Galileo और BeiDou जैसी प्रणालियां शामिल हैं।
- PNT यानी Positioning, Navigation and Timing सेवाएं विमानन, नौवहन, दूरसंचार और आपात प्रतिक्रिया में उपयोगी होती हैं।
- Data interoperability का अर्थ है अलग-अलग प्रणालियों का मानक प्रारूप में भू-स्थानिक डेटा का आदान-प्रदान और उपयोग कर पाना।
आईआईटी तिरुपति में हुई यह बैठक भारत की उस भूमिका को रेखांकित करती है, जिसमें वह भू-स्थानिक विज्ञान और तकनीकी सहयोग के क्षेत्र में ब्रिक्स साझेदारी को आगे बढ़ाने का केंद्र बन रहा है।