अराकू के ओल्ड सीड फेस्टिवल ने स्वदेशी बीज संरक्षण का संदेश दिया

अराकू के ओल्ड सीड फेस्टिवल ने स्वदेशी बीज संरक्षण का संदेश दिया

आंध्र प्रदेश के अराकू क्षेत्र के किल्लोगुडा गांव में आयोजित 17वें वार्षिक ओल्ड सीड फेस्टिवल ने स्वदेशी बीज विविधता के संरक्षण और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की आवश्यकता को प्रमुखता से सामने रखा। संजीविनी संस्था द्वारा आयोजित इस महोत्सव में आदिवासी किसान, शोधकर्ता, पर्यावरणविद् और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

यह आयोजन पारंपरिक कृषि, जनजातीय जैव विविधता और टिकाऊ खेती के महत्व को उजागर करने वाला एक महत्वपूर्ण मंच बना। इसके माध्यम से यह संदेश दिया गया कि स्वदेशी बीज केवल कृषि की पहचान नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण संतुलन की भी मजबूत नींव हैं।

किसानों ने प्रदर्शित की पारंपरिक बीज विविधता

अराकू, रामपचोडावरम, तमिलनाडु के नीलगिरि और ओडिशा के कोरापुट से आए किसानों ने इस महोत्सव में कई प्रकार के पारंपरिक बीजों का प्रदर्शन किया। इनमें मोटे अनाज, दालें, कंद फसलें और स्थानीय फसल किस्में शामिल थीं, जो आदिवासी कृषि प्रणालियों के अनुकूल हैं।

कार्यक्रम की शुरुआत गांव में एक पारंपरिक जुलूस से हुई, जिसमें प्रतिभागियों ने संरक्षित बीजों को लेकर यात्रा निकाली। यह स्वदेशी फसलों की सुरक्षा और संरक्षण का प्रतीक माना गया। पारंपरिक ढोल वादन और धीमसा नृत्य ने इस आयोजन को सांस्कृतिक महत्व भी प्रदान किया।

कंद बीज संरक्षण बना मुख्य आकर्षण

इस महोत्सव का सबसे प्रमुख आकर्षण डुम्ब्रिगुड़ा मंडल के गोंडीवलासा गांव के किसानों द्वारा प्रस्तुत 80 प्रकार के कंद बीजों की प्रदर्शनी रही। इस प्रदर्शन ने आगंतुकों और कृषि विशेषज्ञों का विशेष ध्यान आकर्षित किया।

किसानों ने बीज संरक्षण की पारंपरिक तकनीकों, खेती की पद्धतियों और इन स्वदेशी फसलों की जलवायु अनुकूलता के बारे में विस्तार से जानकारी दी। पारंपरिक कंद फसलें इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती हैं क्योंकि इन्हें कम बाहरी संसाधनों की आवश्यकता होती है और ये स्थानीय पारिस्थितिकी के लिए अधिक उपयुक्त होती हैं।

प्राकृतिक खेती को मिला प्रोत्साहन

रायथु साधिकार संस्था के कार्यकारी निदेशक टी. बाबूराव नायडू ने प्रदर्शनी का निरीक्षण किया और किसानों से बीज गुणवत्ता तथा खेती की विधियों पर चर्चा की।

बीज प्रदर्शनी प्रतियोगिता में गोंडिवलासा की सुकरी, तमिलनाडु के मणिकांत और महाराष्ट्र के प्रतीक मोरी को सम्मानित किया गया। विभिन्न संगठनों और शोध संस्थानों के प्रतिनिधियों ने संजीविनी संस्था की 17 वर्षों से स्वदेशी बीज संरक्षण और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने के प्रयासों की सराहना की।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • धीमसा आंध्र प्रदेश के अराकू घाटी क्षेत्र की प्रमुख आदिवासी लोकनृत्य शैली है।
  • ओडिशा का कोरापुट क्षेत्र कृषि जैव विविधता और मोटे अनाज की खेती के लिए प्रसिद्ध है।
  • अराकू घाटी जैविक कॉफी उत्पादन के लिए जानी जाती है।
  • स्वदेशी बीज संरक्षण जलवायु अनुकूलता, खाद्य सुरक्षा और जैव विविधता को मजबूत करता है।

महोत्सव में प्रतिभागियों ने अराकू क्षेत्र में जैविक खेती समूहों को संस्थागत मान्यता देने की मांग भी की। उनका मानना है कि आदिवासी कृषि प्रणाली न केवल पर्यावरण संतुलन बनाए रखती है, बल्कि ग्रामीण आजीविका को भी मजबूत करती है। यह आयोजन पारंपरिक कृषि ज्ञान की रक्षा और सतत विकास को बढ़ावा देने की दिशा में एक प्रेरणादायक उदाहरण है।

Originally written on April 29, 2026 and last modified on April 29, 2026.

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