अंतरिक्ष कचरा घटाने की दिशा में इसरो की नई रणनीति
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने लो अर्थ ऑर्बिट यानी पृथ्वी के निचले कक्ष में बढ़ते अंतरिक्ष कचरे को कम करने के लिए अपनी कोशिशें तेज कर दी हैं। उपग्रह समूहों की संख्या बढ़ने के साथ टकराव का जोखिम भी बढ़ रहा है, इसलिए इसरो ने ऐसे उपायों पर जोर दिया है जिनसे नए मलबे का निर्माण रोका जा सके और पहले से मौजूद कचरे को हटाने की दिशा में काम आगे बढ़े।
लो अर्थ ऑर्बिट में क्यों बढ़ रही चिंता
लो अर्थ ऑर्बिट पृथ्वी की सतह से लगभग 2,000 किलोमीटर तक का क्षेत्र है। यही वह कक्षा है जहां पृथ्वी अवलोकन उपग्रह, मानवयुक्त मिशन और बड़े इंटरनेट उपग्रह समूह सक्रिय रहते हैं। इस क्षेत्र में उपग्रहों की भीड़ सबसे अधिक है, इसलिए यहां किसी भी खराब या निष्क्रिय उपग्रह से टकराव की आशंका बनी रहती है।
अंतरिक्ष कचरे में निष्क्रिय उपग्रह, रॉकेट के इस्तेमाल हो चुके चरण और टकराव या विस्फोट से बने छोटे-छोटे टुकड़े शामिल होते हैं। बड़ी उपग्रह प्रणालियां अपने आप टकराव से बचने की क्षमता रखती हैं, लेकिन जो यान खराब हो जाते हैं या जिन्हें नियंत्रित नहीं किया जा सकता, वे खतरा बने रहते हैं। छोटे कणों को ट्रैक करना भी मुश्किल होता है, इसलिए वे सामान्य बचाव प्रणाली से नहीं बचाए जा सकते।
डीएफएसएम और एडीआर पर इसरो का फोकस
इसरो का Debris Free Space Mission (DFSM) ऐसा ढांचा है, जिसका उद्देश्य नए कक्षीय मलबे के निर्माण को सीमित करना है। इसके तहत मिशन डिजाइन, संचालन और मिशन-समाप्ति के बाद की प्रक्रिया में ऐसे कदम शामिल किए जाते हैं, जिनसे अंतरिक्ष में बेकार वस्तुएं कम से कम रहें।
Active Debris Removal (ADR) यानी सक्रिय मलबा हटाने की तकनीकें और मिशन, पहले से मौजूद अंतरिक्ष कचरे को पकड़ने, उसकी कक्षा बदलने या उसे निष्क्रिय करने के लिए बनाए जाते हैं। इसरो ने एडीआर के लिए प्रारंभिक ऑन-ऑर्बिट प्रदर्शनों की शुरुआत की है, हालांकि किसी पूर्ण परिचालन प्रणाली की लॉन्च तिथि अभी घोषित नहीं की गई है।
भारत की कक्षा-निपटान नीति और वैश्विक सहयोग
भारतीय अंतरिक्ष नीति और IN-SPACe द्वारा जारी मानकों के अनुसार भारतीय अंतरिक्ष संस्थाओं को अंतरराष्ट्रीय रूप से मान्य पोस्ट-मिशन डिस्पोजल प्रथाओं का पालन करना होता है। इनमें नियंत्रित पुनःप्रवेश, प्राकृतिक कक्षीय क्षय को तेज करना या ऐसी अन्य विधियां शामिल हैं, जिनसे लंबे समय तक मलबा न बने।
भारत कुछ मिशनों के लिए 5-वर्षीय कक्षीय क्षय दिशा-निर्देश अपनाता है, जिसके तहत ऊपरी चरण और अंतरिक्ष यान को मिशन पूरा होने के पांच साल के भीतर वायुमंडल में लौट आना चाहिए। 2 नवंबर 2025 को प्रक्षेपित LVM3 M5 रॉकेट का ऊपरी चरण 30 जुलाई 2026 को अटलांटिक महासागर के ऊपर वायुमंडल में पुनः प्रवेश कर गया, जो इस दिशा-निर्देश के अनुरूप था।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- लो अर्थ ऑर्बिट पृथ्वी से लगभग 2,000 किलोमीटर ऊंचाई तक का क्षेत्र है।
- अंतरिक्ष कचरे में निष्क्रिय उपग्रह, रॉकेट चरण और टकराव से बने टुकड़े शामिल होते हैं।
- इंटर-एजेंसी स्पेस डेब्रिस कोऑर्डिनेशन कमेटी का गठन 1993 में हुआ था और इसरो 1996 से इसका सदस्य है।
- कक्षा में टकराव से बनने वाली श्रृंखला प्रतिक्रिया को केसलर सिंड्रोम कहा जाता है।
अंतरिक्ष गतिविधियों के बढ़ते दायरे में कचरा प्रबंधन अब केवल तकनीकी मुद्दा नहीं, बल्कि मिशन सुरक्षा और दीर्घकालिक अंतरिक्ष उपयोग की अनिवार्य शर्त बन गया है। इसरो की यह पहल भारत को जिम्मेदार और टिकाऊ अंतरिक्ष संचालन की दिशा में और आगे ले जाती है।