3D AI की दुनिया में भारतीय दिमाग का डंका: IIIT हैदराबाद ने दुनिया को चौंकाया
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की रेस में आज पूरी दुनिया दौड़ रही है। चैटजीपीटी और मिडजर्नी जैसे टूल्स ने हमारी स्क्रीन को तो बदल दिया है, लेकिन असली चुनौती तब आती है जब एआई को हमारे जैसी त्रि-आयामी यानी 3D दुनिया को समझना और बनाना पड़ता है। इसी 3D AI के क्षेत्र में भारत के एक संस्थान ने वैश्विक स्तर पर वह कर दिखाया है, जिसने दुनिया भर के टेक दिग्गजों को हैरान कर दिया है। कंप्यूटर विजन और एआई की दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित वैश्विक सम्मेलन ‘CVPR 2026’ (कंप्यूटर विजन एंड पैटर्न रिकग्निशन) में हैदराबाद के इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IIIT-H) के शोधकर्ताओं ने बड़ी सफलता हासिल की है। इस वैश्विक मंच पर, जहां दुनिया भर से 16,000 से अधिक रिसर्च पेपर्स भेजे गए थे, IIIT हैदराबाद के सेंटर फॉर विजुअल इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (CVIT) ने न सिर्फ अपनी धाक जमाई, बल्कि ‘बेस्ट पेपर’ और ‘बेस्ट पेपर रनर-अप’ जैसे शीर्ष पुरस्कार भी अपने नाम किए।
क्या है 3D AI और क्यों थमी थी इसकी रफ्तार?
आज के समय में एआई किसी भी फोटो या टेक्स्ट प्रॉम्प्ट से बेहद शानदार 3D मॉडल तैयार कर सकता है। गेमिंग, वर्चुअल रियलिटी (VR) और मेडिकल साइंस में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन इस तकनीक के साथ एक बहुत बड़ी समस्या जुड़ी हुई थी। जब एआई कोई 3D ऑब्जेक्ट बनाता है, तो वह अनगिनत छोटे-छोटे त्रिकोणों (Triangles) को आपस में जोड़कर एक ढांचा तैयार करता है, जिसे तकनीकी भाषा में ‘मेश’ (Mesh) कहा जाता है। ये मॉडल इतने ज्यादा विस्तृत होते हैं कि इनमें लाखों त्रिकोण शामिल हो जाते हैं। नतीजा यह होता है कि ये फाइलें साइज में बहुत भारी हो जाती हैं। इन्हें स्टोर करने के लिए भारी-भरकम कंप्यूटर और डेटा सर्वर की जरूरत पड़ती है, जिससे ये आम स्मार्टफोन या सामान्य कंप्यूटर पर ठीक से काम नहीं कर पाते। इसी भारीपन को दूर करने का रास्ता खोज निकाला है हैदराबाद के एक छात्र ने।

कुणाल भोसीकर का वो आविष्कार, जिसने 3D ग्राफिक्स का बोझ कम कर दिया
IIIT हैदराबाद के डुअल डिग्री ग्रेजुएट कुणाल भोसीकर ने इस समस्या को सुलझाने के लिए एक बेहद अनोखी तकनीक विकसित की। उनके रिसर्च पेपर “फास्ट एंड रोबस्ट मेश सिम्प्लीफिकेशन फॉर जनरेटेड एंड रियल वर्ल्ड 3-D एसेट्स” को इस कॉन्फ्रेंस में बेस्ट पेपर रनर-अप का अवॉर्ड मिला है। कुणाल ने यह रिसर्च टीसीएस रिसर्च (TCS Research) के डॉ. लोकेंद्र तिवारी के मार्गदर्शन में पूरी की। कुणाल की तकनीक एआई द्वारा बनाए गए 3D मॉडल्स में से उन गैर-जरूरी त्रिकोणों को समझदारी से हटा देती है, जिनकी वजह से फाइल भारी हो रही होती है। सबसे खास बात यह है कि इस काट-छांट के बाद भी उस 3D ऑब्जेक्ट के असली आकार, चमक और बनावट (Texture) पर कोई फर्क नहीं पड़ता। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी हाई-क्वालिटी भारी फोटो को बिना उसकी विजुअल क्वालिटी खराब किए एक हल्की फाइल में बदल दिया जाए। इस तकनीक के आने से अब 3D मॉडल्स बहुत हल्के हो जाएंगे, जिससे वे तेजी से प्रोसेस हो सकेंगे। इसका सीधा फायदा मेडिकल क्षेत्र में डॉक्टरों को मिलेगा, जो मरीज के अंगों के 3D मॉडल्स को आसानी से और तेजी से देखकर सटीक इलाज कर सकेंगे। साथ ही, वर्चुअल रियलिटी (VR) और मेटावर्स के शौकीनों को बिना किसी रुकावट या लैग के एक स्मूथ अनुभव मिल सकेगा।

दर्शन सिंह का कमाल: भारी-भरकम डेटा के बिना वीडियो समझेगा AI
इसी कॉन्फ्रेंस में IIIT-H के एक और मास्टर ग्रेजुएट दर्शन सिंह ने डेटा-एफिशिएंट वीडियो इंटेलिजेंस के क्षेत्र में बाजी मारी। उनके रिसर्च पेपर “SRL-CLIP” को बेस्ट पेपर का खिताब मिला। आज के समय में एआई को वीडियो समझाने के लिए करोड़ों वीडियो क्लिप्स और भारी डेटासेट की जरूरत पड़ती है। दर्शन सिंह ने एक ऐसा तरीका खोजा जिससे एआई बहुत कम डेटा का इस्तेमाल करके भी वीडियो को गहराई से समझ सकता है। उन्होंने इसके लिए ‘स्ट्रक्चर्ड सिमेंटिक रोल लेबल्स’ का इस्तेमाल किया। आसान शब्दों में कहें तो, एआई को यह सिखाया गया कि वीडियो में ‘कौन क्या कर रहा है और किस संदर्भ में कर रहा है’। इस सटीक जानकारी की वजह से एआई लाखों उबाऊ और आधे-अधूरे विवरण वाले वीडियो की बजाय, बहुत कम मगर सटीक डेटा से ही वीडियो को पूरी तरह समझने में सक्षम हो गया।
तस्वीरों की चोरी रोकने के लिए बनाया डिजिटल सुरक्षा कवच
आजकल इंटरनेट पर एक और बड़ा खतरा मंडरा रहा है। कोई भी आपकी साधारण तस्वीरों को उठाकर एआई की मदद से उसका अनधिकृत 3D मॉडल तैयार कर सकता है। IIIT हैदराबाद की टीम ने प्राइवेसी के इस बड़े खतरे का भी तोड़ निकाल लिया है। संस्थान के शोधकर्ताओं ने “पैचपॉइजन” (PatchPoison) नाम की एक तकनीक पर काम किया है। यह फोटोग्राफर्स और क्रिएटर्स के लिए एक डिजिटल सुरक्षा कवच की तरह है। इसके तहत तस्वीरों में एक ऐसा अदृश्य डिजिटल पैच छुपा दिया जाता है, जो इंसानी आंखों को तो दिखाई नहीं देता, लेकिन जैसे ही कोई एआई सिस्टम उस तस्वीर का इस्तेमाल करके 3D मॉडल बनाने की कोशिश करेगा, यह पैच उस एआई के सिस्टम को भ्रमित कर देगा। नतीजा यह होगा कि बनने वाला 3D मॉडल पूरी तरह से धुंधला और खराब हो जाएगा। इससे कोई भी आपकी तस्वीरों का गलत इस्तेमाल नहीं कर पाएगा।
परदे के पीछे की चीजों को भी देख लेगा एआई
इसके अलावा वैभव अग्रवाल नाम के शोधकर्ता ने ‘SeeThrough3D’ नाम की तकनीक पेश की। मौजूदा एआई इमेज जनरेटर अक्सर यह समझने में गलती कर देते हैं कि जब एक चीज के पीछे दूसरी चीज छिपी हो, तो उसे कैसे दिखाना है। वैभव की तकनीक ने एआई को यह सिखाया कि सामने और पीछे की वस्तुओं के बीच की दूरी और पोजिशन को कैसे सटीक रखा जाए। इससे एआई द्वारा बनाई गई तस्वीरें और अधिक वास्तविक नजर आती हैं। Deccan Chronicle CVPR 2026 में भारत के इस शानदार प्रदर्शन ने यह साबित कर दिया है कि एआई के भविष्य को आकार देने में भारतीय दिमाग सबसे आगे हैं। तकनीक को केवल इस्तेमाल करने के बजाय, उसे बुनियादी स्तर पर बेहतर और सुरक्षित बनाने में IIIT हैदराबाद के शोधकर्ताओं का यह योगदान आने वाले समय में हमारी डिजिटल दुनिया को पूरी तरह बदलने की ताकत रखता है।