2047 तक इस्पात आत्मनिर्भरता की नई रूपरेखा
भारत 2047 तक के लिए एक नई राष्ट्रीय इस्पात नीति तैयार कर रहा है, जिसमें 600 मिलियन टन से अधिक इस्पात उत्पादन क्षमता और 500 मिलियन टन से अधिक इस्पात खपत का लक्ष्य रखा गया है। यह नीति मौजूदा राष्ट्रीय इस्पात नीति, 2017 की जगह लेगी, जिसकी समय-सीमा 2030 तक थी और जिसमें 300 मिलियन टन क्षमता का लक्ष्य रखा गया था। नई रूपरेखा का मकसद देश के इस्पात क्षेत्र को दीर्घकालिक दिशा देना, कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करना और उत्पादन को अधिक प्रतिस्पर्धी व पर्यावरण-अनुकूल बनाना है।
2047 के लिए बड़ा औद्योगिक रोडमैप
नई नीति को भारत की स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने के साथ जोड़ा गया है। सरकार का मानना है कि इस्पात क्षेत्र बुनियादी ढांचे, निर्माण, विनिर्माण और रक्षा जैसे क्षेत्रों की रीढ़ है, इसलिए इसकी क्षमता बढ़ाना विकास की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। वित्त वर्ष 2026 तक भारत की कच्चे इस्पात की क्षमता 220 मिलियन टन दर्ज की गई है, जबकि प्रस्तावित लक्ष्य इससे कई गुना अधिक है।
नीति का फोकस केवल उत्पादन बढ़ाने पर नहीं, बल्कि मांग, आपूर्ति और तकनीकी उन्नयन के बीच संतुलन बनाने पर भी है। इससे घरेलू उद्योग को लंबी अवधि की स्पष्टता मिलेगी और निवेश के लिए बेहतर माहौल बन सकता है।
कच्चे माल, तकनीक और उत्सर्जन पर जोर
इस्पात उत्पादन में लौह अयस्क, कोकिंग कोयला और ऊर्जा-गहन प्रक्रियाओं की बड़ी भूमिका होती है। इसी को देखते हुए मसौदा नीति में 2047 तक लौह अयस्क की मांग 772 मिलियन टन और कोकिंग कोयले की मांग 214 मिलियन टन रहने का अनुमान रखा गया है। साथ ही, विदेशी परिसंपत्तियों और संयुक्त उपक्रमों के जरिये कच्चे माल तक पहुंच मजबूत करने की योजना भी शामिल है।
नीति में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग, तकनीकी उन्नयन, डीकार्बोनाइजेशन और स्थिरता को प्राथमिकता दी गई है। इसका उद्देश्य उत्पादन क्षमता बढ़ाते हुए कार्बन उत्सर्जन को कम करना है। प्रस्ताव के अनुसार, इस्पात क्षेत्र की औसत कार्बन उत्सर्जन तीव्रता को वर्तमान 2.54 टन प्रति टन कच्चे इस्पात से घटाकर 2047 तक लगभग 1.54 टन प्रति टन करने का लक्ष्य है।
घरेलू उद्योग को संरक्षण और प्रोत्साहन
मसौदे में सस्ते और निम्न गुणवत्ता वाले आयात पर अंकुश लगाने के लिए सुरक्षा उपायों का भी उल्लेख है। इनमें सेफगार्ड ड्यूटी और एंटी-डंपिंग ड्यूटी जैसे कदम शामिल हो सकते हैं, ताकि घरेलू उत्पादकों को अनुचित प्रतिस्पर्धा से राहत मिले। नीति का एक अन्य उद्देश्य देश के भीतर इस्पात की कीमत और तकनीक के स्तर पर प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाना है।
छोटे इस्पात उत्पादकों के लिए प्रस्तावित विकसित भारत इस्पात योजना पर भी काम चल रहा है, जिसका परिव्यय 5,000 करोड़ रुपये बताया गया है। इसके तहत उत्पादन और कम कार्बन उत्सर्जन से जुड़े प्रोत्साहन दिए जाने की संभावना है। बड़े उत्पादकों के लिए कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम को भी जल्द अधिसूचित किए जाने की उम्मीद है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- राष्ट्रीय इस्पात नीति, 2017 का लक्ष्य 2030 तक 300 मिलियन टन क्षमता हासिल करना था।
- नई नीति का समय-क्षेत्र 2047 तक रखा जा रहा है, जो भारत की स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने का वर्ष है।
- वित्त वर्ष 2026 तक भारत की कच्चे इस्पात की क्षमता 220 मिलियन टन थी।
- कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम औद्योगिक उत्सर्जन घटाने की बाजार-आधारित व्यवस्था है।
कुल मिलाकर, यह नई नीति भारत के इस्पात क्षेत्र को क्षमता विस्तार, कच्चे माल की सुरक्षा, तकनीकी आधुनिकीकरण और हरित उत्पादन की दिशा में एक दीर्घकालिक ढांचा देने की कोशिश है।