सिक्किम हिमालय में मिली नई फफूंद से औषधि शोध की उम्मीद
वैज्ञानिकों ने सिक्किम हिमालय में पाई जाने वाली दुर्लभ औषधीय वनस्पति Panax sokpayensis की जड़ से जुड़े भाग से फफूंद की एक नई प्रजाति खोजी है। Mollisia sokpayensia नाम की इस प्रजाति की पहचान अक्टूबर 2026 में हुई। यह खोज हिमालयी जैव विविधता और सूक्ष्मजीवों से मिलने वाले संभावित उपयोगी पदार्थों के अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण है।
दुर्लभ औषधीय पौधे से मिली नई प्रजाति
मणिपुर के वैज्ञानिक डॉ. लैशराम शांतुकुमार सिंह के नेतृत्व वाली टीम में सुबेचा राय, गजानन वी. माने, डॉ. रोहित शर्मा और डॉ. थौनाओजम साल्विया शामिल थे। शोधकर्ताओं ने फफूंद को Panax sokpayensis के भूमिगत तने यानी राइजोम से अलग किया। यह पौधा सिक्किम हिमालय में पाया जाता है और दुर्लभ होने के साथ औषधीय महत्त्व भी रखता है।
Mollisia sokpayensia एक अंतःजीवी फफूंद है। ऐसे सूक्ष्मजीव स्वस्थ पौधों के आंतरिक ऊतकों में रहते हैं, लेकिन सामान्यतः पौधे पर बीमारी के स्पष्ट लक्षण पैदा नहीं करते। इस प्रजाति का विवरण Fungal Diversity के खंड 136 में प्रकाशित हुआ।
प्रयोगशाला में वृद्धि और पहचान
अध्ययन में फफूंद की प्रयोगशाला में वृद्धि का भी विवरण दिया गया। 28 डिग्री सेल्सियस तापमान पर इसकी कॉलोनी छह दिन में 2–3 सेंटीमीटर व्यास तक पहुँची, जबकि 14 दिन बाद इसका व्यास लगभग 8 सेंटीमीटर था। शुरुआत में कॉलोनी का रंग भूरा था, जो बाद में गहरे भूरे-काले रंग में बदल गया। ये वृद्धि और रंग संबंधी विशेषताएँ प्रजाति की पहचान तथा आगे के अध्ययन में उपयोगी हो सकती हैं।
पौधों के भीतर रहने वाली फफूंदों का अध्ययन इसलिए अहम है कि वे अपने मेजबान पौधे के साथ लंबे समय तक रह सकती हैं और उनसे ऐसे रासायनिक पदार्थ मिल सकते हैं जिनकी जैविक गतिविधियों की जाँच की जा सके। हालांकि, किसी पदार्थ का औषधीय उपयोग साबित करने के लिए अलग से विस्तृत परीक्षण आवश्यक होते हैं।
जैव-प्रौद्योगिकी और संरक्षण की संभावनाएँ
शोधकर्ताओं के अनुसार, आगे का अध्ययन दवा-विकास और जैव-प्रौद्योगिकी के लिए उपयोगी सूक्ष्मजीवी संसाधनों की पहचान में मदद कर सकता है। यदि इस फफूंद को प्रयोगशाला में उगाना संभव हो, तो इसके अध्ययन के लिए दुर्लभ औषधीय पौधों की बार-बार कटाई की जरूरत कम हो सकती है। यह संभावना खास तौर पर ऐसे पौधों के संरक्षण के संदर्भ में उपयोगी है, जिनकी उपलब्धता सीमित है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- अंतःजीवी फफूंद पौधों के आंतरिक ऊतकों में रहती हैं और स्वस्थ पौधे में स्पष्ट रोग-लक्षण जरूरी नहीं कि पैदा करें।
- कुछ अंतःजीवी फफूंद पौधे के जीवनकाल में लगातार मौजूद रह सकती हैं, जबकि कुछ की संख्या और विविधता परिस्थितियों के साथ बदलती है।
- इनका प्रसार जनक पौधे से संतति तक हो सकता है; एक पौधे से दूसरे पौधे तक प्रसार बीजाणुओं के माध्यम से भी संभव है।
- अंतःजीवी सूक्ष्मजीवों से मिलने वाले द्वितीयक उपापचयज दवा-विकास के शुरुआती शोध में संभावित प्रमुख यौगिकों के रूप में जाँचे जा सकते हैं।
Mollisia sokpayensia की खोज हिमालयी पौधों और उनसे जुड़े सूक्ष्मजीवों की विविधता को समझने का एक नया अवसर देती है। आगे के परीक्षण ही इसके व्यावहारिक उपयोग और संरक्षण संबंधी योगदान को स्पष्ट करेंगे।