सतपुड़ा में बारहसिंगा की आबादी 300 के पार, संरक्षण को मिली नई मजबूती
मध्य प्रदेश के सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में कठोर भूमि वाले बारहसिंगा की आबादी 10 अक्टूबर 2026 तक बढ़कर लगभग 303 हो गई। यह आबादी कान्हा राष्ट्रीय उद्यान से लाए गए बारहसिंगों और सतपुड़ा में जन्मी उनकी अगली पीढ़ियों से मिलकर बनी है।
कान्हा से सतपुड़ा तक संरक्षण प्रयास
मध्य प्रदेश वन विभाग ने वर्ष 2015 में सतपुड़ा में बारहसिंगा को फिर से बसाने का कार्यक्रम शुरू किया था। इसके तहत 2015 से 2026 के बीच कान्हा राष्ट्रीय उद्यान से लगभग 135 बारहसिंगों को सतपुड़ा स्थानांतरित किया गया। वन्यजीव संरक्षण में इस तरह एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जानवरों को ले जाने की प्रक्रिया को स्थानांतरण कहा जाता है।
वर्तमान आबादी केवल मूल रूप से लाए गए जानवरों तक सीमित नहीं है। सतपुड़ा में प्राकृतिक प्रजनन से कई पीढ़ियां जन्मी हैं, जो पुनर्वास कार्यक्रम की प्रगति का संकेत देती हैं। ऐसे प्रयासों की सफलता के लिए उपयुक्त आवास, नियमित निगरानी और भोजन-पानी की उपलब्धता जरूरी होती है।
तीन क्षेत्रों में स्थापित आबादी
सतपुड़ा के अलग-अलग हिस्सों में बारहसिंगों की तीन आबादी इकाइयां स्थापित हुई हैं। ये बोरी बाड़े, बोरी घास के मैदान और चुरना क्षेत्र के मालिनी घास के मैदानों से जुड़ी हैं। घास के मैदान इस प्रजाति को भोजन और आड़ देते हैं, जबकि पानी की उपलब्धता भी उनके रहने और प्रजनन के लिए अहम है।
वन प्रबंधक सतपुड़ा क्षेत्र के कम से कम छह घास के मैदानों को जोड़ने वाले गलियारों की योजना बना रहे हैं। ऐसे गलियारे अलग-अलग आवासों के बीच वन्यजीवों की आवाजाही आसान बनाते हैं। इससे बारहसिंगा भोजन, पानी और प्रजनन के लिए मौसमी रूप से एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक जा सकेंगे। अलग समूहों के बीच संपर्क से उनकी आबादी और आनुवंशिक विविधता को भी सहारा मिल सकता है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- सतपुड़ा में बारहसिंगा पुनर्वास कार्यक्रम मध्य प्रदेश वन विभाग ने 2015 में शुरू किया।
- बारहसिंगों को कान्हा राष्ट्रीय उद्यान से सतपुड़ा लाया गया।
- 10 अक्टूबर 2026 तक सतपुड़ा में इनकी अनुमानित आबादी लगभग 303 थी।
- गलियारा योजना का उद्देश्य सतपुड़ा के कम से कम छह घास के मैदानों को जोड़ना है।
सतपुड़ा में आबादी का बढ़ना पुनर्वास और प्राकृतिक प्रजनन, दोनों की भूमिका को दर्शाता है। अब इन समूहों के बीच आवासीय संपर्क बनाए रखना संरक्षण की अगली महत्वपूर्ण जरूरत है।