कान्हा में जंगली भैंसों की वापसी से मध्य प्रदेश के संरक्षण प्रयासों को बल

कान्हा में जंगली भैंसों की वापसी से मध्य प्रदेश के संरक्षण प्रयासों को बल

मध्य प्रदेश में करीब एक सदी बाद जंगली जल भैंसों की वापसी की प्रक्रिया शुरू हुई है। 11 अक्टूबर 2026 को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कान्हा टाइगर रिजर्व के सुपखार क्षेत्र में आठ भैंसों को 17 हेक्टेयर के घेरे में छोड़ा। ये सभी असम के काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान से लाई गई हैं। फिलहाल इन्हें खुले जंगल में नहीं छोड़ा गया है।

असम से कान्हा तक पहुंचा संरक्षण कार्यक्रम

कान्हा में भैंसों का पहला समूह 28 अप्रैल 2026 को पहुंचा था। इसमें तीन मादाएं और एक नर था। दूसरा समूह 9 मई को आया, जिसमें भी तीन मादाएं और एक नर शामिल थे। इस तरह कान्हा में मौजूद आठ भैंसों में छह मादाएं और दो नर हैं।

बड़े घेरे में भेजने से पहले इन्हें एक हेक्टेयर के छोटे घेरे में रखा गया, जहां अनुकूलन और संगरोध की व्यवस्था की गई। संगरोध का उद्देश्य एक क्षेत्र की वन्यजीव आबादी से दूसरे क्षेत्र में संक्रामक रोग फैलने का जोखिम घटाना है। मानसून के बाद इन्हें धीरे-धीरे प्राकृतिक आवास में छोड़ने की तैयारी है।

तीन वर्ष में 50 भैंसों का लक्ष्य

मध्य प्रदेश की योजना अगले तीन वर्षों में कान्हा क्षेत्र में कुल 50 जंगली जल भैंसों को फिर से बसाने की है। इस कार्यक्रम के लिए असम ने चरणबद्ध तरीके से 50 भैंसें उपलब्ध कराने पर सहमति दी है। मौजूदा आठ भैंसें इसी अंतरराज्यीय प्रयास का हिस्सा हैं। इन्हें बड़े घेरे में रखना खुले जंगल में छोड़े जाने से पहले की तैयारी है।

जंगली जल भैंस घास के मैदानों, आर्द्रभूमियों और वन क्षेत्रों में रहती है तथा पानी तक पहुंच उसके आवास का अहम हिस्सा है। इसलिए पुनर्स्थापन की सफलता के लिए उपयुक्त आवास और वन्यजीव प्रबंधन जरूरी होंगे। इस पहल से मध्य प्रदेश के जंगलों में इस प्रजाति की वापसी की संभावना बनेगी।

प्रजाति और कान्हा का संरक्षण महत्व

जंगली जल भैंस का वैज्ञानिक नाम Bubalus arnee है। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ की लाल सूची में इसे संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया है। भारत के वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची एक में भी इसे शामिल किया गया है।

कान्हा टाइगर रिजर्व मध्य प्रदेश की मैकल पर्वतमाला में स्थित है और इसमें कान्हा राष्ट्रीय उद्यान शामिल है। राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना 1955 में हुई थी, जबकि 1973 में इसे बाघ परियोजना में शामिल किया गया। काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान असम में स्थित है और वह भी बाघ अभयारण्य है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • जंगली जल भैंस का वैज्ञानिक नाम Bubalus arnee है।
  • भारत में बाघ परियोजना की शुरुआत 1973 में हुई थी।
  • काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान असम में स्थित है।
  • कान्हा में रखे गए आठ भैंसों में छह मादाएं और दो नर हैं।

कान्हा में यह पहल जंगली जल भैंसों को उनके पुराने आवास में लौटाने की दिशा में शुरुआती कदम है। आगे की सफलता इनके सुरक्षित अनुकूलन और चरणबद्ध पुनर्स्थापन पर निर्भर करेगी।

Originally written on October 12, 2026 and last modified on October 12, 2026.

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