संयुक्त राष्ट्र में भारत की सक्रियता से बहुपक्षीय सहयोग को नई धार
भारत ने 22 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय पर आयोजित पहले ‘पार्टनर्स फॉर मल्टीलैटरलिज्म’ (P4M) शिखर सम्मेलन का सह-प्रायोजन किया। यह सम्मेलन संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के मौके पर हुआ और इसकी सह-अध्यक्षता विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने की। इस पहल के जरिए उन देशों को एक साझा मंच मिला है, जो संयुक्त राष्ट्र-आधारित बहुपक्षवाद को मजबूत करने के पक्षधर हैं।
बहुपक्षवाद पर केंद्रित नई पहल
‘पार्टनर्स फॉर मल्टीलैटरलिज्म’ एक लचीला और खुला ढांचा है, जिसका उद्देश्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाना है, खासकर उन मुद्दों पर जिन पर सुधार और साझा सहमति की जरूरत है। इस पहल की शुरुआत यूरोपीय संघ, ब्राजील, केन्या और कनाडा ने की थी। इसका मूल विचार यह है कि वैश्विक चुनौतियों का समाधान किसी एक देश के बजाय कई देशों के समन्वय से अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।
भारत की भूमिका और साझेदार देश
भारत इस सम्मेलन का सह-प्रायोजक रहा, और उसके साथ ऑस्ट्रेलिया, बारबाडोस, ब्राजील, कनाडा, केन्या तथा यूरोपीय संघ भी जुड़े। इससे यह संदेश गया कि भारत उन देशों के समूह में शामिल है जो संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के भीतर सहयोग, संवाद और नियम-आधारित व्यवस्था को महत्व देते हैं। भारत की भागीदारी को वैश्विक मंचों पर उसकी बढ़ती कूटनीतिक सक्रियता के रूप में भी देखा जा रहा है।
कौन-से मुद्दे चर्चा में रहे
सम्मेलन में मजबूत बहुपक्षवाद, वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में सुधार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में व्यापक भागीदारी जैसे विषयों पर चर्चा हुई। इसके अलावा 4F संकट पर भी ध्यान दिया गया, जिसमें ईंधन, खाद्य, उर्वरक और वित्त से जुड़ी चुनौतियां शामिल हैं। बैठक में उभरती प्रौद्योगिकियों के लिए सुरक्षा-प्रावधान, और आपूर्ति शृंखलाओं के विविधीकरण जैसे मुद्दे भी उठे, जो मौजूदा वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- संयुक्त राष्ट्र महासभा संयुक्त राष्ट्र का मुख्य विचार-विमर्श मंच है और इसकी बैठक हर साल न्यूयॉर्क में होती है।
- 81वां सत्र वर्ष 2026 में आयोजित हुआ, और इसी के दौरान पहला P4M शिखर सम्मेलन हुआ।
- ‘4F संकट’ का अर्थ ईंधन, खाद्य, उर्वरक और वित्त से जुड़ी चुनौतियां है।
- बहुपक्षवाद का अर्थ तीन या अधिक देशों के बीच साझा संस्थाओं, नियमों और प्रक्रियाओं के जरिए सहयोग है।
यह सम्मेलन दिखाता है कि संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भारत की भूमिका केवल भागीदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि वह वैश्विक सुधार, सहयोग और नियम-आधारित व्यवस्था को आगे बढ़ाने में भी सक्रिय है।