वन्यजीव आबादी में गिरावट: ताजे पानी के जीव सबसे अधिक प्रभावित
विश्व वन्यजीव कोष (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) और जूलॉजिकल सोसाइटी ऑफ लंदन (जेडएसएल) ने 8 अक्टूबर 2026 को ‘लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट 2026’ जारी की। रिपोर्ट के अनुसार, 1970 से 2022 के बीच निगरानी में शामिल वन्यजीव आबादियों के औसत आकार में दुनिया भर में 73 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई। यह आंकड़ा जैव विविधता पर बढ़ते दबाव को रेखांकित करता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पृथ्वी की 73 प्रतिशत वन्यजीव प्रजातियां विलुप्त हो गई हैं।
जीवित ग्रह सूचकांक क्या बताता है
रिपोर्ट का प्रमुख मापदंड ‘लिविंग प्लैनेट इंडेक्स’ (एलपीआई) है। यह समय के साथ निगरानी की जा रही कशेरुकी जीव आबादियों की सापेक्ष संख्या में बदलाव को मापता है। कशेरुकी जीवों में मछलियां, उभयचर, सरीसृप, पक्षी और स्तनधारी शामिल हैं। इस अध्ययन में 5,790 प्रजातियों की 35,803 आबादी-प्रवृत्तियों का विश्लेषण किया गया। इसलिए 73 प्रतिशत की गिरावट निगरानी में शामिल आबादियों के औसत बदलाव को दर्शाती है, न कि सभी प्रजातियों की संख्या या विलुप्ति को।
आवास के प्रकार के अनुसार सबसे बड़ी गिरावट मीठे पानी के जीवों में रही। 1970 से 2022 के बीच इनकी आबादियों में औसतन 85 प्रतिशत कमी दर्ज हुई। इसी अवधि में स्थलीय आबादियों में 69 प्रतिशत और समुद्री आबादियों में 59 प्रतिशत गिरावट रही। क्षेत्रीय स्तर पर लैटिन अमेरिका और कैरेबियन में 95 प्रतिशत, अफ्रीका में 80 प्रतिशत तथा एशिया-प्रशांत क्षेत्र में 49 प्रतिशत कमी दर्ज की गई।
वन्यजीवों पर दबाव और बदलाव की जरूरत
रिपोर्ट आवासों का नष्ट होना और उनका क्षरण, वन्यजीवों का अत्यधिक दोहन, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, आक्रामक बाहरी प्रजातियां और रोग—इन छह कारकों को जैव विविधता के लिए प्रमुख प्रत्यक्ष खतरे बताती है। इन दबावों का संबंध वैश्विक खाद्य, ऊर्जा और वित्तीय व्यवस्थाओं की कमजोरियों से भी है।
रिपोर्ट में ‘सकारात्मक निर्णायक मोड़’ का विचार दिया गया है—ऐसे बदलाव, जो व्यवस्था में बड़े और तेज परिवर्तन को बढ़ावा दे सकते हैं। ऊर्जा क्षेत्र में नवीकरणीय ऊर्जा का तेजी से विस्तार ऐसा मोड़ पार करने का उदाहरण है। इसके विपरीत, खाद्य और वित्तीय व्यवस्थाएं अभी बदलाव को सक्षम बनाने के शुरुआती चरणों में हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक इन क्षेत्रों में अधिक परिवर्तन की जरूरत होगी।
गिरावट के बीच संरक्षण से मिली उम्मीद
रिपोर्ट का उपशीर्षक ‘आशा का विज्ञान’ है। इसके अनुसार, वैश्विक एलपीआई में शामिल लगभग आधी आबादियां स्थिर हैं या बढ़ रही हैं। 15 वर्षों में जंगली बाघों की आबादी 70 प्रतिशत से अधिक बढ़ी है और अफ्रीकी हाथियों की आबादियां स्थिर या बढ़ती हुई बताई गई हैं। हरे समुद्री कछुए और अटलांटिक ब्लूफिन टूना को भी संरक्षण में सुधार के बाद संकटग्रस्त सूची से हटाया गया।
भारत में बाघ, एशियाई शेर और एक सींग वाले गैंडे की आबादियों में वृद्धि दर्ज की गई है। देश में एशियाई शेरों की संख्या 2020 के 674 से बढ़कर 2025 में 891 हुई। गंगा नदी डॉल्फिन की पहली विज्ञान-आधारित गणना में इनकी संख्या 6,324 आंकी गई।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- लिविंग प्लैनेट इंडेक्स निगरानी में शामिल कशेरुकी आबादियों के रुझान मापता है; यह पृथ्वी की सभी प्रजातियों की गणना नहीं है।
- तीन प्रमुख आवास श्रेणियों में मीठे पानी के जीवों में सबसे अधिक औसत गिरावट, 85 प्रतिशत, दर्ज की गई।
- रिपोर्ट ने वन्यजीवों के लिए छह प्रमुख दबाव बताए: आवास क्षरण, अत्यधिक दोहन, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, आक्रामक प्रजातियां और रोग।
- हरे समुद्री कछुए और अटलांटिक ब्लूफिन टूना संरक्षण के बाद संकटग्रस्त सूची से हटाए जाने के उदाहरण हैं।
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि वन्यजीव आबादियों पर दबाव व्यापक है, पर संरक्षण के ठोस प्रयासों से सुधार संभव है। आवासों की रक्षा और खाद्य, ऊर्जा तथा वित्तीय व्यवस्थाओं में बदलाव इस दिशा में अहम होंगे।