लिव-इन संबंध और कानूनी मान्यता
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि कोई लिव-इन संबंध पूरी तरह सहमति पर आधारित है, तो उस संबंध को छोड़ देना अपने आप में कोई आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि केवल भावनात्मक पीड़ा या संबंध टूटने से किसी सहमति वाले रिश्ते को आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता। यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें एक महिला ने अपने पूर्व साथी पर यौन शोषण और उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए आपराधिक कार्रवाई की मांग की थी।
सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण अवलोकन
न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि जब दोनों पक्षों ने स्वेच्छा से लिव-इन संबंध में रहना स्वीकार किया था, तब बाद में संबंध समाप्त होने पर उसे यौन शोषण या यौन उत्पीड़न नहीं कहा जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि लिव-इन संबंध विवाह की तरह कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते।
पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति ऐसे संबंध से बाहर निकलता है, तो केवल इसी आधार पर उसके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी जोड़ा कि नैतिक आचरण और कानूनी अपराध में अंतर समझना आवश्यक है।
संबंध की प्रकृति पर अदालत के सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह देखा कि महिला लगभग 15 वर्षों तक उस व्यक्ति के साथ रही और दोनों का एक बच्चा भी है। ऐसे में अदालत ने पूछा कि इतने लंबे समय तक सहमति से साथ रहने के बाद इसे बाद में यौन उत्पीड़न कैसे माना जा सकता है।
महिला के वकील ने तर्क दिया कि वह 18 वर्ष की आयु में विधवा हो गई थी और विवाह के झूठे वादे के आधार पर इस संबंध में आई थी। यह भी कहा गया कि पुरुष ने कई बार विवाह किया। हालांकि अदालत ने कहा कि वह केवल कानूनी पहलू पर विचार कर सकती है, न कि किसी व्यक्ति के निजी नैतिक व्यवहार पर।
बच्चे के अधिकार सुरक्षित
हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने आपराधिक मुकदमे की अनुमति नहीं दी, लेकिन उसने यह स्पष्ट किया कि महिला अपने आठ वर्षीय बच्चे के लिए भरण-पोषण की मांग कर सकती है। अदालत ने माना कि बच्चे के अधिकार माता-पिता के संबंध की प्रकृति से प्रभावित नहीं होते।
इस मामले में अदालत ने मध्यस्थता के अनुरोध पर केवल भरण-पोषण के मुद्दे तक सीमित नोटिस जारी किया और कहा कि इस विषय पर अलग से विचार किया जाएगा। इससे यह स्पष्ट होता है कि न्यायालय बच्चों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है।
कानूनी मान्यता और सामाजिक बहस
भारत में लिव-इन संबंधों को कुछ नागरिक सुरक्षा के लिए कानूनी मान्यता प्राप्त है, लेकिन इन्हें विवाह के समान दर्जा नहीं दिया गया है। घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 में “विवाह जैसी प्रकृति के संबंध” को भी संरक्षण दिया गया है।
इसके अलावा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत ऐसे संबंधों से जन्मे बच्चों के लिए भरण-पोषण का दावा किया जा सकता है। अदालतों ने बार-बार कहा है कि वयस्कों को अपनी पसंद से साथ रहने का अधिकार है, बशर्ते वह संबंध सहमति पर आधारित हो।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम वर्ष 2005 में लागू किया गया था।
- दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 भरण-पोषण के अधिकार से संबंधित है।
- भारत का संविधान वयस्कों को अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता देता है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने कई मामलों में लिव-इन संबंधों को सामाजिक वास्तविकता के रूप में स्वीकार किया है।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय यह दर्शाता है कि सहमति, कानूनी जिम्मेदारी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना कितना आवश्यक है। साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया गया है कि बच्चों के अधिकार किसी भी परिस्थिति में सुरक्षित रहें।