मिजोरम में खोजी गई नई कृमिभक्षी सांप प्रजाति
पूर्वोत्तर भारत के जैव विविधता समृद्ध क्षेत्र से वैज्ञानिकों ने एक नई सांप प्रजाति की पहचान की है। Trachischium lalremsangai नामक यह नई कृमिभक्षी सांप प्रजाति 19 मई 2026 को वैज्ञानिक पत्रिका Herpetozoa में प्रकाशित शोध के माध्यम से दुनिया के सामने आई। इस प्रजाति का नाम मिजोरम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हमार तलावमटे लालरेमसांगा के सम्मान में रखा गया है, जिन्होंने हर्पेटोलॉजी और पूर्वोत्तर भारत की जैव विविधता पर महत्वपूर्ण शोध कार्य किए हैं। यह खोज भारत और म्यांमार के सीमावर्ती क्षेत्रों की समृद्ध जैव विविधता को भी उजागर करती है।
ट्रैचिशियम वंश की विशेषताएं
Trachischium सांपों का एक पतला और छोटे आकार का वंश है, जो कोलुब्रिडी परिवार से संबंधित माना जाता है। इन्हें सामान्यतः “वर्म-ईटिंग स्नेक” या कृमिभक्षी सांप कहा जाता है क्योंकि ये मुख्य रूप से केंचुओं और छोटे भूमिगत जीवों को भोजन बनाते हैं। यह वंश मुख्य रूप से हिमालयी क्षेत्र और उत्तर-पूर्व भारत में पाया जाता है। नई खोजी गई Trachischium lalremsangai इस वंश की ग्यारहवीं मान्यता प्राप्त प्रजाति बन गई है।
खोज और वैज्ञानिक अध्ययन
इस नई प्रजाति का पहला नमूना मिजोरम के मुरलेन नेशनल पार्क में एक अभियान के दौरान मिला था। यह क्षेत्र भारत-म्यांमार सीमा के पास स्थित है और अपनी समृद्ध वन संपदा तथा दुर्लभ जीव-जंतुओं के लिए प्रसिद्ध है। बाद में 2007 में म्यांमार के चिन राज्य से एक अन्य नमूना एकत्र किया गया था, जिसकी पहचान सितंबर 2025 में सैन फ्रांसिस्को स्थित कैलिफोर्निया एकेडमी ऑफ साइंसेज के संग्रह में की गई। वैज्ञानिकों ने दोनों नमूनों की तुलना कर यह पुष्टि की कि यह सांप पहले से ज्ञात किसी भी प्रजाति से अलग है। इसके बाद इसे नई प्रजाति के रूप में मान्यता दी गई।
नई प्रजाति की पहचान
इस सांप की कई विशेष शारीरिक विशेषताएं इसे अन्य प्रजातियों से अलग बनाती हैं। इसका पेट हल्के भूरे रंग का होता है तथा आंखों के पीछे दो विशेष स्केल पाए जाते हैं। इसके शरीर पर चिकने और चमकदार इंद्रधनुषी स्केल मौजूद हैं। सांप का शरीर भूरा दिखाई देता है जबकि नीचे की सतह पर सफेद धब्बे पाए जाते हैं। वैज्ञानिकों ने इसका नाम lalremsangai प्रोफेसर लालरेमसांगा के सम्मान में रखा है। उन्होंने इंडो-बर्मा जैव विविधता हॉटस्पॉट में सरीसृपों और उभयचरों पर व्यापक शोध किया है और अनेक छात्रों को वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए प्रेरित किया है।
भारत में हर्पेटोलॉजी का महत्व
हर्पेटोलॉजी जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसमें सरीसृपों और उभयचरों का अध्ययन किया जाता है। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में जैव विविधता अत्यंत समृद्ध है, इसलिए यह क्षेत्र हर्पेटोलॉजी अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। मिजोरम विश्वविद्यालय ने पिछले वर्षों में क्षेत्रीय सरीसृपों पर कई अध्ययन किए हैं, जिससे नई प्रजातियों की खोज में सहायता मिली है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- Trachischium वंश के सांपों को सामान्यतः कृमिभक्षी या पतले सांप कहा जाता है।
- मुरलेन नेशनल पार्क मिजोरम राज्य में स्थित है और यह जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है।
- कैलिफोर्निया एकेडमी ऑफ साइंसेज अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को शहर में स्थित एक प्रमुख वैज्ञानिक संस्थान है।
- इंडो-बर्मा जैव विविधता हॉटस्पॉट एशिया के महत्वपूर्ण जैव विविधता क्षेत्रों में शामिल है।
नई प्रजातियों की खोज न केवल वैज्ञानिक ज्ञान को बढ़ाती है बल्कि यह भी दर्शाती है कि पृथ्वी पर अभी भी कई जीव ऐसे हैं जिनके बारे में मानव को पूरी जानकारी नहीं है। Trachischium lalremsangai की खोज पूर्वोत्तर भारत की पारिस्थितिक समृद्धि और वहां के वैज्ञानिक अनुसंधान की सफलता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जा रही है।