माथिक्केट्टन शोला में नई लिचेन प्रजाति, पश्चिमी घाट की जैव विविधता को नई पहचान
केरल के इडुक्की जिले स्थित माथिक्केट्टन शोला राष्ट्रीय उद्यान से लिचेन की एक नई प्रजाति Buellia maharajensis दर्ज की गई है। यह खोज न केवल पश्चिमी घाट की जैव विविधता को रेखांकित करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि ऊंचाई वाले संरक्षित वन क्षेत्रों में अब भी कई सूक्ष्म जीव-जंतु और वनस्पति प्रजातियाँ विज्ञान की नजर से अनदेखी रह गई हैं।
क्या है यह नई खोज
नई प्रजाति को लगभग 1,351 मीटर की ऊंचाई पर चट्टानों पर पाया गया। यह एक saxicolous lichen है, यानी ऐसी लिचेन जो सीधे चट्टानी सतहों पर उगती है। इसका नाम महाराजा कॉलेज, एर्नाकुलम के 150 वर्ष पूरे होने के सम्मान में रखा गया है। यह नामकरण संस्थान की शैक्षणिक विरासत और शोध परंपरा को भी प्रतीकात्मक रूप से जोड़ता है।
लिचेन क्यों हैं खास
लिचेन कोई एकल जीव नहीं, बल्कि फफूंद और प्रकाश संश्लेषण करने वाले साथी, आमतौर पर शैवाल या सायनोबैक्टीरिया, के बीच सहजीवी संबंध से बनने वाले संयुक्त जीव हैं। ये चट्टानों, पेड़ों की छाल, मिट्टी और अन्य सतहों पर पाए जाते हैं। पर्यावरणीय अध्ययन में लिचेन को महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इनकी विविधता अक्सर आवास की गुणवत्ता और वायु की स्थिति का संकेत देती है।
माथिक्केट्टन शोला और शोध का महत्व
माथिक्केट्टन शोला राष्ट्रीय उद्यान पश्चिमी घाट के उन संरक्षित क्षेत्रों में शामिल है, जहां शोला वन पारिस्थितिकी तंत्र पाया जाता है। शोला वन दक्षिणी पश्चिमी घाट की ऊंची घाटियों में मिलने वाले पर्वतीय सदाबहार वन हैं। इस खोज को पांच सदस्यीय शोध दल ने अंजाम दिया, जिसमें महाराजा कॉलेज, केरल वन अनुसंधान संस्थान और सीएसआईआर–राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान, लखनऊ से जुड़े विशेषज्ञ शामिल थे। अध्ययन के निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय वनस्पति पत्रिका Taiwania में प्रकाशित हुए।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- Buellia लिचेन का एक वंश है, जो Caliciaceae परिवार में आता है।
- माथिक्केट्टन शोला राष्ट्रीय उद्यान केरल के इडुक्की जिले में, संथनपारा के पास स्थित है।
- शोला वन मुख्य रूप से पश्चिमी घाट के ऊपरी हिस्सों में पाए जाते हैं।
- भारत में संरक्षित क्षेत्रों का प्रबंधन वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत होता है।
विस्तृत जैव विविधता सर्वेक्षण में पार्क से लगभग 250 लिचेन प्रजातियाँ दर्ज की गईं। इनमें 60 प्रजातियाँ केरल में पहली बार और 15 प्रजातियाँ भारत के लिए नई रिकॉर्ड के रूप में सामने आईं। यह खोज बताती है कि पश्चिमी घाट जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में सूक्ष्म जैव विविधता का दस्तावेजीकरण अभी भी जारी है और संरक्षण के लिए ऐसे अध्ययन बेहद जरूरी हैं।