त्रिपुरा ने प्राथमिक शिक्षा में शून्य ड्रॉपआउट का लक्ष्य हासिल किया

त्रिपुरा ने प्राथमिक शिक्षा में शून्य ड्रॉपआउट का लक्ष्य हासिल किया

त्रिपुरा ने 2025-26 शैक्षणिक वर्ष में प्राथमिक स्तर यानी कक्षा 1 से 5 तक शून्य ड्रॉपआउट दर दर्ज की है। राज्य सरकार ने इस उपलब्धि को UDISE+ के आंकड़ों से जोड़ा है। यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2013-14 में प्राथमिक ड्रॉपआउट दर 2.21 प्रतिशत थी, जो अब घटकर शून्य पर पहुंच गई है।

प्राथमिक शिक्षा में बड़ा सुधार

स्कूली शिक्षा के आधिकारिक आंकड़ों में प्राथमिक शिक्षा आमतौर पर कक्षा 1 से 5 तक मानी जाती है। त्रिपुरा का यह प्रदर्शन बताता है कि नामांकन बनाए रखने, बच्चों की नियमित उपस्थिति और स्कूलों तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए राज्य में लगातार प्रयास किए गए हैं। शून्य ड्रॉपआउट का अर्थ है कि प्राथमिक स्तर पर कोई भी बच्चा पढ़ाई बीच में छोड़कर स्कूल प्रणाली से बाहर नहीं गया।

राज्य ने इस उपलब्धि के पीछे निपुण भारत मिशन और सहरशा त्रिपुरा कार्यक्रम की भूमिका बताई है। निपुण भारत का फोकस बुनियादी साक्षरता और संख्याज्ञान पर है, जबकि सहरशा त्रिपुरा जैसे कार्यक्रम सीखने की गुणवत्ता और बच्चों की शैक्षिक भागीदारी को मजबूत करने में मदद करते हैं।

माध्यमिक स्तर पर भी गिरावट, लेकिन चुनौती बनी हुई

त्रिपुरा में केवल प्राथमिक स्तर ही नहीं, बल्कि माध्यमिक स्तर पर भी ड्रॉपआउट दर में उल्लेखनीय कमी आई है। 2013-14 में यह दर 25.51 प्रतिशत थी, जो 2025-26 में घटकर 10.40 प्रतिशत रह गई। यह सुधार सकारात्मक है, लेकिन यह भी दिखाता है कि ऊपरी कक्षाओं में बच्चों को स्कूल से जोड़े रखने के लिए अभी और काम करने की जरूरत है।

राज्य सरकार ने दूरस्थ और ग्रामीण क्षेत्रों में कम नामांकन वाले स्कूलों के विलय की योजना भी सामने रखी है। इसके साथ ही वंचित क्षेत्रों के छात्रों के लिए एकलव्य मॉडल स्कूलों की तर्ज पर आधुनिक आवासीय स्कूलों का प्रस्ताव रखा गया है। इन कदमों का उद्देश्य शिक्षा तक पहुंच, संसाधनों का बेहतर उपयोग और सीखने के माहौल को मजबूत करना है।

ओपन स्कूलिंग, बालवाटिका और वयस्क साक्षरता पर जोर

त्रिपुरा सरकार ने बोर्ड ऑफ ओपन स्कूलिंग एंड एग्जामिनेशन, त्रिपुरा को भी मंजूरी दी है। इससे उन विद्यार्थियों को अवसर मिल सकता है जो किसी कारणवश नियमित स्कूल प्रणाली से बाहर रह गए हों। इसके अलावा, राज्य ने सभी 2,048 प्राथमिक स्कूलों में दो वर्षों के भीतर बालवाटिका शुरू करने की योजना बनाई है। बालवाटिका का मतलब प्री-प्राइमरी शिक्षा है, जो बच्चों को कक्षा 1 से पहले सीखने के लिए तैयार करती है।

वयस्क शिक्षा के क्षेत्र में भी ULLAS कार्यक्रम के तहत गतिविधियां चलाई गई हैं। इसमें वयस्कों के लिए वित्तीय साक्षरता, बाजार गणना कौशल और स्वास्थ्य-स्वच्छता से जुड़े सत्र शामिल हैं। यह पहल बताती है कि शिक्षा को केवल बच्चों तक सीमित न रखकर व्यापक सामाजिक सुधार से जोड़ा जा रहा है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • UDISE+ का पूरा नाम Unified District Information System for Education Plus है और यह भारत में स्कूल शिक्षा से जुड़े आधिकारिक आंकड़े जुटाने के लिए उपयोग होता है।
  • निपुण भारत मिशन का लक्ष्य बच्चों में बुनियादी साक्षरता और संख्याज्ञान विकसित करना है।
  • एकलव्य मॉडल स्कूल अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए आवासीय विद्यालयों की केंद्रीय योजना है।
  • बालवाटिका कक्षा 1 से पहले की प्री-प्राइमरी शिक्षा को कहा जाता है।

त्रिपुरा का यह प्रदर्शन स्कूल शिक्षा में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है। प्राथमिक स्तर पर शून्य ड्रॉपआउट और माध्यमिक स्तर पर गिरती दरें बताती हैं कि राज्य शिक्षा पहुंच, ठहराव और गुणवत्ता—तीनों मोर्चों पर आगे बढ़ रहा है।

Originally written on September 9, 2026 and last modified on September 9, 2026.

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