मणिपुर में मिली नई कैटफ़िश प्रजाति, पूर्वोत्तर की जैव-विविधता पर नई रोशनी
मणिपुर में वैज्ञानिकों ने दुर्लभ कैटफ़िश की एक नई प्रजाति Exostoma nasibarbatum की पहचान की है। यह मछली बुपाल नदी में मिली, जो डुजांग नदी की सहायक धारा है। यह क्षेत्र म्यांमार सीमा के पास चिंदविन नदी तंत्र में स्थित है। इसकी खोज पूर्वोत्तर भारत की नदी-आधारित जैव-विविधता के बारे में जानकारी बढ़ाती है।
तेज बहाव वाली धारा में मिला नया जीव
इस प्रजाति की पहचान बुपाल धारा में किए गए मछली-विज्ञान संबंधी सर्वेक्षण के दौरान हुई। यहां पानी का बहाव तेज और अशांत है तथा नदी तल पर बड़े पत्थर और चट्टानें मौजूद हैं। Exostoma nasibarbatum का शरीर ऐसी परिस्थितियों के अनुकूल है। इसका सिर और शरीर चपटे हैं, जिससे तेज बहाव वाले पानी में रहने में मदद मिलती है।
इसके जोड़ीदार पंख बड़े हैं और उन पर चिपकने में सहायक धारियां पाई जाती हैं। ये विशेषताएं मछली को चट्टानी सतहों पर टिके रहने में मदद कर सकती हैं। इसके नासिका के पास स्थित लंबे स्पर्शक आंख के पिछले किनारे से आगे तक जाते हैं। इन्हीं संवेदनशील अंगों के संदर्भ में प्रजाति का नाम रखा गया है।
स्पर्शकों से जुड़ा है प्रजाति का नाम
इसके वैज्ञानिक नाम nasibarbatum में लैटिन के nasus यानी नाक और barba यानी दाढ़ी शब्दों का मेल है। यह नाम मछली के लंबे नासिका स्पर्शकों की ओर संकेत करता है। इसके मैक्सिलरी स्पर्शक चपटे होते हैं। कैटफ़िश में स्पर्शक आसपास के वातावरण को महसूस करने में उपयोगी होते हैं; कई बड़ी कैटफ़िश में इन पर रासायनिक संकेत पहचानने वाले संवेदक भी पाए जाते हैं।
मणिपुर से म्यांमार तक फैले नदी तंत्र का महत्व
इस प्रजाति का विवरण 1 नवंबर 2026 को जर्नल ऑफ नेचुरल हिस्ट्री में प्रकाशित हुआ। शोध दल का नेतृत्व धनमंजुरी विश्वविद्यालय के प्राणीशास्त्र विभाग के सहायक प्राध्यापक बुंगडोन शांगनिंगम ने किया। दल में पीएचडी शोधार्थी पाया तोरिशा अनाल भी शामिल थीं। शांगनिंगम 2012 से भारत और म्यांमार में मछलियों की 39 नई प्रजातियों की पहचान कर चुके हैं; इनमें अधिकांश कैटफ़िश हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- Exostoma nasibarbatum एक दुर्लभ ग्लिप्टोस्टर्नाइन कैटफ़िश है।
- यह प्रजाति चिंदविन नदी तंत्र की बुपाल धारा में पाई गई।
- कैटफ़िश के मैक्सिला भाग में बदलाव के कारण वे कार्प मछलियों की तरह मुंह आगे नहीं निकाल पातीं।
- कैटफ़िश में शल्क नहीं होते; उनकी बाहरी त्वचा चिकनी भी हो सकती है और कुछ प्रजातियों में कवच जैसी भी।
इस खोज से मणिपुर की नदी-प्रणालियों में अब तक दर्ज न हुई प्रजातियों की मौजूदगी सामने आई है। ऐसे सर्वेक्षण सीमावर्ती नदी क्षेत्रों की जैव-विविधता को समझने और उसके संरक्षण की जरूरत पहचानने में मदद करते हैं।