तमिल नाम वाला चक्रवात मुरसु ओंगोल तट से टकराया
गंभीर चक्रवाती तूफान मुरसु ने 3 नवंबर 2026 की सुबह आंध्र प्रदेश के ओंगोल के पास तट पर दस्तक दी। इसका केंद्र भारतीय समयानुसार सुबह 5:30 बजे तट पार कर गया। उत्तर हिंद महासागर में चक्रवातों के नामकरण की शुरुआत सितंबर 2004 में होने के बाद मुरसु तमिल नाम वाला पहला उष्णकटिबंधीय चक्रवात है।
ओंगोल के पास हुआ चक्रवात का लैंडफॉल
मुरसु के तट पार करने का अनुमानित समय सुबह 3:30 से 5:30 बजे के बीच था। भारतीय मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार, तूफान के दोपहर तक चक्रवाती तूफान और आधी रात तक गहरे दबाव में कमजोर होने की संभावना थी। इसके साथ जुड़ी हवाओं की गति घटकर लगभग 75 किलोमीटर प्रति घंटा रहने का अनुमान था।
चक्रवात के असर से आंध्र प्रदेश के बापटला, गुंटूर, कृष्णा, पलनाडु, एनटीआर, एलुरु और पश्चिम गोदावरी जिलों में भारी से बहुत भारी वर्षा का पूर्वानुमान जारी किया गया था। कुछ स्थानों पर अत्यंत भारी बारिश की आशंका भी जताई गई। समुद्र में ज्वार के सामान्य स्तर से 1 से 1.5 मीटर ऊंची तूफानी लहरों के कारण निचले इलाकों में पानी भरने का खतरा था, खासकर बापटला, कृष्णा और प्रकाशम जिलों में।
मुरसु नाम का अर्थ और नामकरण व्यवस्था
‘मुरसु’ तमिल परंपरा का एक बड़ा ताल वाद्य है। ऐतिहासिक रूप से इसका इस्तेमाल सूचना फैलाने, लोगों को प्राकृतिक आपदाओं के प्रति सतर्क करने और तेज आवाज के जरिए संदेश देने के लिए किया जाता था। इस चक्रवात का नाम चेन्नई स्थित क्षेत्रीय मौसम विज्ञान केंद्र ने सुझाया था।
उत्तर हिंद महासागर में चक्रवातों के नाम विश्व मौसम विज्ञान संगठन और संयुक्त राष्ट्र एशिया एवं प्रशांत के लिए आर्थिक तथा सामाजिक आयोग के संयुक्त पैनल के समन्वय से तय किए जाते हैं। भारत इस नामकरण व्यवस्था में योगदान देने वाला सदस्य है। नामों से मौसम पूर्वानुमान और चेतावनियों का संचार सरल होता है तथा एक ही समुद्री क्षेत्र में एक साथ सक्रिय तूफानों को लेकर भ्रम कम होता है।
तटीय जिलों में बचाव और राहत की तैयारी
चक्रवात के खतरे को देखते हुए प्रशासन ने करीब 30 हजार लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया। ओंगोल में कई फूस के मकान ढह गए, जिसके बाद बचाव अभियान चलाया गया। निचले इलाकों में संभावित जलभराव और तेज वर्षा को देखते हुए लोगों को सुरक्षित स्थानों पर बनाए रखना राहत प्रयासों का अहम हिस्सा था।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- उत्तर हिंद महासागर के चक्रवातों का नामकरण सितंबर 2004 में शुरू हुआ था।
- भारतीय मौसम विभाग चक्रवात को नाम तब देता है, जब वह चक्रवाती तूफान की श्रेणी तक पहुंचता है। इसके लिए तीन मिनट की निरंतर हवा की गति कम से कम 34 नॉट होनी चाहिए।
- पारंपरिक मुरसु के प्रकारों में वीर मुरसु का उपयोग सैन्य कार्यों में, त्याग मुरसु का उपहारों की घोषणा और न्याया मुरसु का न्यायिक कार्यवाही के लिए होता था।
- चक्रवातों के नाम पूर्वानुमान और चेतावनी को स्पष्ट रूप से संप्रेषित करने में मदद करते हैं तथा एक ही क्षेत्र में कई तूफान होने पर भ्रम घटाते हैं।
मुरसु का नाम तमिल सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा है, जबकि इसका असर आंध्र प्रदेश के कई तटीय और आंतरिक जिलों में महसूस किया गया। समय पर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना संभावित वर्षा, तूफानी लहरों और मकानों को हुए नुकसान के बीच राहत कार्यों के लिए महत्वपूर्ण रहा।