बिहार की गाद नीति: बाढ़ नियंत्रण और निर्माण सामग्री का दोहरा लक्ष्य

बिहार की गाद नीति: बाढ़ नियंत्रण और निर्माण सामग्री का दोहरा लक्ष्य

बिहार ने नदी-गाद के प्रबंधन को बाढ़ नियंत्रण और बुनियादी ढांचे के विकास से जोड़ने वाली व्यापक नीति शुरू की है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने 3 नवंबर 2026 को बताया कि बिहार ऐसी नीति लागू करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है। राज्य मंत्रिमंडल ने 15 सितंबर को बिहार जलस्रोत पुनर्जीवन एवं गाद प्रबंधन नीति 2026 को मंजूरी दी थी।

नदी क्षमता और बाढ़ प्रबंधन पर जोर

नीति का उद्देश्य नदियों की जलधारण क्षमता और प्रवाह को बेहतर बनाना तथा बार-बार आने वाली बाढ़ के जोखिम को घटाना है। इसमें गंगा, कोसी, बागमती, कमला-बालन और गंडक जैसी नदियों के प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया गया है। इन नदियों में जमा गाद का वैज्ञानिक तरीके से निष्कासन जलमार्गों की क्षमता बनाए रखने में मदद कर सकता है।

गाद को केवल हटाने योग्य अवशेष मानने के बजाय नीति उसे उपयोगी संसाधन के रूप में भी देखती है। निकाली गई मिट्टी और रेत का इस्तेमाल राजमार्ग निर्माण, नए नगरों के विकास और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में किया जा सकता है। इससे नदी प्रबंधन और निर्माण सामग्री की उपलब्धता के बीच तालमेल बनाने की कोशिश है।

राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं से जुड़ाव

2 नवंबर को केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने बिहार की नदियों और जलस्रोतों से गाद निकालने तथा प्राप्त सामग्री को राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं में लगाने की योजना की जानकारी दी। बिहार सरकार के साथ समझौता ज्ञापन पर उसी दिन हस्ताक्षर किए जाने का कार्यक्रम था। उपलब्ध जानकारी में इसके हस्ताक्षर की पुष्टि नहीं है, इसलिए इसे प्रस्तावित साझेदारी के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

30 अक्टूबर को मुख्यमंत्री चौधरी ने राष्ट्रीय स्तर पर गाद प्रबंधन नीति बनाने की मांग भी उठाई थी। उन्होंने दिसंबर 2026 में नवीनीकरण के लिए निर्धारित गंगा जल बंटवारा संधि में बिहार के हितों को ध्यान में रखने की बात कही। यह पहल विकसित भारत–2047 से जुड़ी उन सिफारिशों के अनुरूप है, जिनमें राज्यों से दिसंबर 2026 तक जलस्रोत पुनर्जीवन और गाद प्रबंधन की रूपरेखा तैयार करने को कहा गया है।

पर्यावरणीय सावधानी और क्रियान्वयन

गाद निकालने से नदी का प्रवाह बेहतर हो सकता है, लेकिन बिना योजना के की गई खुदाई जलीय जीवों के आवास और नदी पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचा सकती है। विशेषज्ञों ने उचित तरीकों, निगरानी और पर्यावरणीय प्रभावों पर ध्यान देने की आवश्यकता बताई है। इसलिए नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि निष्कासन कार्य कहां, कितनी मात्रा में और किस विधि से किया जाता है। बाढ़ प्रबंधन भारत में मुख्यतः राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है, जबकि केंद्रीय जल आयोग तकनीकी मार्गदर्शन और बाढ़ पूर्वानुमान उपलब्ध कराता है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • नदी के अलावा हवा, हिमनद और गुरुत्वाकर्षण भी तलछट को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाते हैं।
  • जलधारा की शक्ति के साथ तलछट के कणों का आकार, मात्रा, घनत्व और आकृति यह तय करते हैं कि वे पानी में बने रहेंगे या नीचे बैठेंगे।
  • 1996 की गंगा जल बंटवारा संधि के तहत फरक्का में जल बंटवारे के क्रियान्वयन की निगरानी के लिए भारत-बांग्लादेश संयुक्त समिति बनाई गई थी।
  • बाढ़ प्रबंधन की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है; केंद्रीय जल आयोग नदी घाटियों के लिए तकनीकी सलाह और बाढ़ पूर्वानुमान देता है।

बिहार की नीति गाद को बाढ़ प्रबंधन और निर्माण कार्यों से जोड़ने का प्रयास है। इसके परिणाम प्रभावी क्रियान्वयन और नदी पारिस्थितिकी की सुरक्षा के बीच संतुलन पर निर्भर करेंगे।

Originally written on November 3, 2026 and last modified on November 3, 2026.

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