बिना जान वाले रसायनों से पैदा हुई ‘कृत्रिम जिंदगी’, स्पडसेल की खोज और विज्ञान का नया अध्याय

बिना जान वाले रसायनों से पैदा हुई ‘कृत्रिम जिंदगी’, स्पडसेल की खोज और विज्ञान का नया अध्याय

बिना किसी जान वाले रसायनों को मिलाकर एक ऐसी परखनली तैयार की जाए, जिसमें अचानक हलचल शुरू हो जाए—वह खाना खाने लगे, अपना आकार बढ़ाने लगे और अपने जैसे बच्चे पैदा करने लगे। यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी जैसा लग सकता है, लेकिन विज्ञान की दुनिया में यह सच हो चुका है। यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा के वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में एक ऐसा कृत्रिम सेल (सिंथेटिक सेल) तैयार किया है, जो बिल्कुल किसी जीवित जीव की तरह बर्ताव कर रहा है। इस अनोखे आविष्कार को वैज्ञानिकों ने ‘स्पडसेल’ (SpudCell) नाम दिया है। विज्ञान की दुनिया में इसे ‘बॉटम-अप सिंथेटिक बायोलॉजी’ की अब तक की सबसे बड़ी कामयाबी माना जा रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि वैज्ञानिकों ने पहले से मौजूद किसी जीवित जीव के डीएनए में कोई बदलाव नहीं किया है। इसके बजाय, उन्होंने पूरी तरह से निर्जीव रसायनों को आपस में जोड़कर एक नई और जिंदा कोशिका को जन्म दिया है। इस ऐतिहासिक कामयाबी ने सदियों पुराने उस दार्शनिक और वैज्ञानिक सवाल को दोबारा जिंदा कर दिया है कि आखिर पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत कैसे हुई थी और क्या इंसान अब लैब में पूरी तरह से स्वतंत्र जीवन का निर्माण करने के बेहद करीब पहुंच चुका है?

क्या है स्पडसेल और इसे कैसे बनाया गया?

सरल शब्दों में समझें तो स्पडसेल वसा या फैट (लिपिड्स) की एक बेहद सूक्ष्म बूंद है, जिसके भीतर जीवन की बुनियादी मशीनरी को फिट किया गया है। माइक्रोस्कोप से देखने पर इसका आकार एक छोटे आलू की तरह दिखाई देता है। इसी वजह से वैज्ञानिकों ने इसे मजाकिया अंदाज में ‘स्पडसेल’ नाम दिया, जो अंतरिक्ष में भेजे गए दुनिया के पहले कृत्रिम उपग्रह ‘स्पुतनिक’ को भी एक तरह का सम्मान है। इसे बनाने के लिए वैज्ञानिकों ने किसी प्राकृतिक जीवित कोशिका का सहारा नहीं लिया। उन्होंने लैब में लगभग सौ अलग-अलग तरह के प्रोटीन, एंजाइम और रसायनों का एक खास लिक्विड सूप तैयार किया। इस सूप में ई-कोलाई बैक्टीरिया और टी7 नाम के वायरस से लिए गए कुछ चुनिंदा जीन्स को मिलाया गया। जब इस मिश्रण में वसा के कण डाले गए, तो उन्होंने खुद-ब-खुद गोल बुलबुलों का रूप ले लिया और अपने अंदर इस रासायनिक सूप को कैद कर लिया। हैरानी की बात यह रही कि इन हजारों बुलबुलों में से कुछ के अंदर रसायनों का ऐसा सटीक संतुलन बैठा कि उन्होंने एक जीवित कोशिका की तरह काम करना शुरू कर दिया।

प्राकृतिक कोशिकाओं से कितना अलग है स्पडसेल?

कुदरती तौर पर मिलने वाली किसी भी सामान्य कोशिका या बैक्टीरिया में हजारों जीन्स होते हैं। अगर इंसानी शरीर की बात करें तो हमारे सेल्स में इनकी संख्या 20 हजार से भी ज्यादा है। वैज्ञानिकों के सामने हमेशा यह चुनौती थी कि जीवन को चलाने के लिए कम से कम कितने जीन्स की जरूरत होती है। स्पडसेल ने इस थ्योरी को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। वैज्ञानिकों ने स्पडसेल को केवल 36 जीन्स के एक बेहद छोटे जीनोम (लगभग 90 हजार बेस पेयर्स) के साथ तैयार किया है। पहले के वैज्ञानिक अध्ययनों में माना जाता था कि किसी भी कोशिका को जिंदा रहने के लिए कम से कम 113 जीन्स की जरूरत होती है। लेकिन स्पडसेल इतने छोटे जीनोम के साथ भी वे सारे काम कर रहा है जो एक सामान्य जिंदा कोशिका करती है। यह अपने आसपास के माहौल से पोषक तत्वों को खींचता है, खुद के आकार को बढ़ाता है, अपने डीएनए की हूबहू कॉपी तैयार करता है और अंत में दो हिस्सों में टूटकर नए सेल्स को जन्म देता है।

टॉप-डाउन और बॉटम-अप तकनीक का बड़ा अंतर

सिंथेटिक बायोलॉजी में जीवन बनाने के दो मुख्य तरीके रहे हैं। स्पडसेल से पहले की जीनोम क्राफ्टिंग और इस नई खोज के अंतर को समझना बेहद जरूरी है। पहले वैज्ञानिक किसी जीवित बैक्टीरिया को लेते थे और उसके भीतर के जीन्स को तब तक बाहर निकालते थे, जब तक कि सिर्फ जिंदा रहने लायक जरूरी जीन्स न बचें। इसे विज्ञान की भाषा में ‘टॉप-डाउन’ तरीका कहा जाता था। इसमें जीवन पहले से मौजूद होता था, वैज्ञानिक बस उसे छोटा करते थे। स्पडसेल पहली ऐसी कामयाबी है जिसे ‘बॉटम-अप’ तरीके से बनाया गया है। यानी नीचे से ऊपर की ओर, जहां शुरुआत पूरी तरह से शून्य से की गई। मरे हुए रसायनों को जोड़कर जीवन की नकल तैयार करना इस तकनीक की वजह से मुमकिन हो पाया है। इसने साबित कर दिया है कि जीवन की बुनियादी प्रक्रियाओं को शुरू करने के लिए किसी ‘जादुई या रहस्यमयी चिंगारी’ की जरूरत नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से केमिस्ट्री का एक सटीक और जटिल संतुलन है।

क्या स्पडसेल को पूरी तरह ‘जिंदा’ माना जा सकता है?

इस अद्भुत कामयाबी के बावजूद, इसे बनाने वाली मुख्य वैज्ञानिक केट एडामाला और उनकी टीम इसे पूरी तरह से ‘जीवित जीव’ कहने से बच रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि स्पडसेल अभी पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है। उसे जिंदा रहने और बढ़ने के लिए प्रयोगशाला में वैज्ञानिकों की लगातार मदद की जरूरत पड़ती है। एक असली प्राकृतिक कोशिका के पास रिबोसोम नाम की एक आंतरिक मशीनरी होती है, जो उसके भीतर प्रोटीन का निर्माण करती है। स्पडसेल के पास जीन्स तो हैं, लेकिन वह खुद के रिबोसोम नहीं बना पाता। इसलिए वैज्ञानिकों को बाहर से ई-कोलाई बैक्टीरिया के रिबोसोम इस रासायनिक सूप में डालने पड़ते हैं। ये रिबोसोम कुछ समय बाद काम करना बंद कर देते हैं, जिसके कारण स्पडसेल की वंश परंपरा केवल 5 से 10 पीढ़ियों तक ही चल पाती है और उसके बाद यह निष्क्रिय हो जाता है। इसके अलावा, विभाजन के समय इसका डीएनए हमेशा अगली पीढ़ी में पूरी तरह ट्रांसफर नहीं हो पाता। यही वजह है कि कुछ वैज्ञानिक इसे अभी केवल ‘बायो-इंजन’ मान रहे हैं, पूरी तरह से स्वतंत्र जीवन नहीं।

स्पडसेल से कैसे बदल जाएगी भविष्य की दुनिया?

भले ही यह अभी लैब के भीतर एक छोटा सा बुलबुला मात्र हो, लेकिन आने वाले समय में यह तकनीक चिकित्सा, पर्यावरण और उद्योग जगत को पूरी तरह बदलने की ताकत रखती है। प्राकृतिक कोशिकाएं बहुत जटिल होती हैं और उनके भीतर हजारों तरह के केमिकल रिएक्शन एक साथ चलते हैं, जिससे उन्हें अपनी मर्जी से कंट्रोल करना बेहद मुश्किल होता है। इसके विपरीत, स्पडसेल एक साफ स्लेट या ब्लूप्रिंट की तरह है, जिसके हर एक पुर्जे की जानकारी वैज्ञानिकों के पास है। भविष्य में इन सिंथेटिक सेल्स को प्रोग्राम करके ऐसी दवाइयां और इंसुलिन बनाई जा सकेंगी जो आज की तुलना में सौ गुना ज्यादा सटीक और असरदार होंगी। इन्हें इस तरह डिजाइन किया जा सकता है कि ये वातावरण से हानिकारक कार्बन डाइऑक्साइड को सोख सकें और ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में मदद करें। इसके अलावा, शरीर के भीतर जाकर कैंसर जैसी बीमारियों को पहचानने वाले बायो-सेंसर और समुद्र में फैले प्लास्टिक कचरे को साफ करने वाले सूक्ष्म जैविक रोबोट बनाने में भी स्पडसेल की तकनीक एक मील का पत्थर साबित होने वाली है। वैज्ञानिक अब स्पडसेल के अगले वर्जन पर काम कर रहे हैं, जिसमें इसे खुद के रिबोसोम बनाना सिखाया जाएगा, जिसके बाद यह हमेशा के लिए अमर हो सकेगा।

सिंथेटिक बायोलॉजी से जुड़े कुछ बेहद दिलचस्प और अनसुने फैक्ट्स

विज्ञान के इतिहास में कृत्रिम जीवन बनाने की कोशिशें हमेशा से विवादों और रोमांच से भरी रही हैं। इस क्षेत्र से जुड़े कुछ ऐसे तथ्य हैं जो हैरान कर देते हैं। साल 2010 में जे. क्रेग वेंटर इंस्टीट्यूट ने दुनिया का पहला सिंथेटिक जीनोम वाला बैक्टीरिया बनाया था, जिसका नाम ‘सिनथिया’ रखा गया था। हालांकि, वह टॉप-डाउन तकनीक पर आधारित था, स्पडसेल की तरह शून्य से नहीं बना था। वैज्ञानिकों ने सिनथिया नाम के उस कृत्रिम बैक्टीरिया के जीनोम के भीतर वॉटरमार्क के रूप में जेम्स जॉयस और रिचर्ड फेनमैन जैसे महान विचारकों के उद्धरण (कोट्स) को डिजिटल कोड में लिखकर सुरक्षित किया था, ताकि भविष्य में उसकी पहचान की जा सके। कृत्रिम जीवन के निर्माण को लेकर दुनिया भर के दार्शनिकों और वैज्ञानिकों में एक बड़ा नैतिक विवाद भी है। कई आलोचकों का मानना है कि लैब में जीवन बनाकर इंसान कुदरत के नियमों के साथ खिलवाड़ कर रहा है, जिसके अनियंत्रित परिणाम हो सकते हैं। स्पडसेल की यह खोज यह भी इशारा करती है कि ब्रह्मांड में दूसरे ग्रहों पर जीवन के लिए हमेशा पृथ्वी जैसी जटिल परिस्थितियों की जरूरत नहीं है। बेहद सरल रसायनों के मेल से भी अंतरिक्ष के किसी कोने में जीवन पनप सकता है। लैब में तैयार किए जा रहे ये सिंथेटिक सेल्स आम जीवों की तरह खुद को पर्यावरण के हिसाब से आसानी से म्यूटेट (रूप बदलना) नहीं कर सकते, जिससे इन्हें एक सीमित दायरे में कंट्रोल करना आसान होता है और इनके लैब से बाहर फैलने का खतरा कम रहता है।

Originally written on July 9, 2026 and last modified on July 9, 2026.

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