बाघ संरक्षण को नई दिशा: वन्यजीव, आजीविका और इकोटूरिज्म पर अंतरराष्ट्रीय मंथन
नई दिल्ली में 2 सितंबर 2026 को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने बाघ परिदृश्यों पर केंद्रित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का उद्घाटन किया। 3 सितंबर तक चली इस बैठक का विषय था: “Tiger Landscapes: Conservation, Bioeconomy and Ecotourism as Pillars for Livelihood and Income Generation”। कार्यशाला का फोकस केवल बाघ संरक्षण तक सीमित नहीं था, बल्कि इस बात पर भी रहा कि वन क्षेत्रों को संरक्षण के साथ स्थानीय आजीविका, जैव-अर्थव्यवस्था और इकोटूरिज्म से कैसे जोड़ा जा सकता है।
बाघ परिदृश्य क्यों हैं अहम
बाघ परिदृश्य उन वन और आवास क्षेत्रों के मिश्रण को कहा जाता है, जहां बाघों की आबादी के साथ-साथ व्यापक जैव विविधता भी पाई जाती है। भारत में बाघ संरक्षण का ढांचा वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972, प्रोजेक्ट टाइगर और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण पर आधारित है। ऐसे परिदृश्य केवल वन्यजीवों के लिए ही नहीं, बल्कि जल सुरक्षा, जलवायु संतुलन और कार्बन अवशोषण जैसे पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के लिए भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
कार्यशाला में किन संस्थाओं की भूमिका रही
इस अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का संयुक्त आयोजन इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस, एशियन डेवलपमेंट बैंक और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने किया। कार्यक्रम के दौरान इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस और एशियन डेवलपमेंट बैंक के बीच एक समझौता ज्ञापन भी हस्ताक्षरित हुआ। यह समझौता परिदृश्य संरक्षण, क्षमता निर्माण और नेचर-पॉजिटिव फाइनेंसिंग से जुड़ा है, यानी ऐसी वित्तीय व्यवस्था जो जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र के सकारात्मक परिणामों को बढ़ावा दे।
संरक्षण के साथ आजीविका पर जोर
भूपेंद्र यादव ने बाघ परिदृश्यों को प्राकृतिक पूंजी के रूप में रेखांकित किया, जो स्थानीय समुदायों के लिए अवसर भी पैदा करते हैं। कार्यशाला में इस बात पर बल दिया गया कि इकोटूरिज्म, यदि जिम्मेदारी से विकसित किया जाए, तो वह वन क्षेत्रों के संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय लोगों की आय का स्रोत बन सकता है। इसी तरह जैव-अर्थव्यवस्था आधारित गतिविधियां भी वन संसाधनों के सतत उपयोग को बढ़ावा दे सकती हैं।
पर्यावरणीय योजना में एकीकृत परिदृश्य प्रबंधन की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसका उपयोग मरुस्थलीकरण, मिट्टी के क्षरण और मिट्टी की नमी में कमी जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए किया जाता है। ऐसे में बाघ परिदृश्यों पर केंद्रित यह पहल संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- भारत में बाघ वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I में सूचीबद्ध है।
- प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत 1973 में एक केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में हुई थी।
- राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण का गठन वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत किया गया था।
- इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस सात बड़ी बिल्ली प्रजातियों के संरक्षण पर केंद्रित एक अंतर-सरकारी पहल है।
यह कार्यशाला संकेत देती है कि बाघ संरक्षण अब केवल प्रजाति बचाने की नीति नहीं, बल्कि वन, समुदाय और अर्थव्यवस्था को साथ जोड़ने वाली व्यापक पर्यावरणीय रणनीति बन चुका है।