बच्चों की सुरक्षा के लिए केरलम में राज्यव्यापी जोखिम मानचित्रण

बच्चों की सुरक्षा के लिए केरलम में राज्यव्यापी जोखिम मानचित्रण

केरलम का महिला एवं बाल विकास विभाग ऐसे बच्चों की पहचान के लिए राज्यव्यापी मानचित्रण की योजना बना रहा है, जिनकी सेहत, शिक्षा या सुरक्षा जोखिम में है। यह निर्णय 23 अक्टूबर 2026 को मंत्री बिंदु कृष्णा की अध्यक्षता में हुई बैठक में लिया गया। इससे पहले 18 अक्टूबर को अलप्पुझा में दो वर्षीय बच्चे की संदिग्ध कुपोषण-संबंधी मृत्यु हुई थी।

जोखिम में रह रहे बच्चों की पहचान और सुरक्षा

इस पहल का उद्देश्य जोखिमपूर्ण परिस्थितियों में रहने वाले बच्चों को पहचानकर उनकी देखभाल, सुरक्षा और पुनर्वास की व्यवस्था करना है। जिला महिला एवं बाल विकास अधिकारियों को पहचाने गए बच्चों की सुरक्षा और पुनर्वास सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई है। इसके लिए स्थानीय स्वशासन संस्थाओं, स्वास्थ्य विभाग और पुलिस का सहयोग लिया जाएगा।

योजना में जिला और ग्राम स्तर की बाल संरक्षण एवं कल्याण समितियों की नियमित बैठकें तथा विभागों के बीच समन्वय शामिल है। बचाव कार्य में बाधा आने पर जिला बाल संरक्षण अधिकारी उच्च स्तर पर हस्तक्षेप की मांग कर सकेंगे। सामाजिक जांच की रिपोर्ट निर्धारित समय-सीमा में बाल कल्याण समितियों को सौंपनी होगी। देखभाल संस्थानों में रहने वाले प्रत्येक बच्चे के लिए अलग देखभाल योजना भी तैयार की जाएगी।

पुनर्वास के बाद भी जारी रहेगी निगरानी

योजना के अनुसार, बच्चे का पुनर्वास हो जाने के बाद भी उसकी स्थिति पर नजर रखी जाएगी। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, समेकित बाल विकास सेवा के पर्यवेक्षक और मनोसामाजिक परामर्शदाता बच्चों के पोषण तथा विकास की निगरानी करेंगे। कुपोषण या उपेक्षा के संकेत मिलने पर तत्काल हस्तक्षेप किया जाएगा।

योजना यह भी स्पष्ट करती है कि माता-पिता का सहयोग न मिलने पर बच्चे की सुरक्षा के प्रयास रोके नहीं जाने चाहिए। इसका आशय है कि संरक्षण से जुड़े अधिकारी और संस्थाएं बच्चे के हित में आवश्यक कदम जारी रखेंगी। इस प्रक्रिया में समयबद्ध जांच, उपयुक्त देखभाल और पुनर्वास के बाद नियमित निगरानी को आपस में जोड़ा गया है।

कानूनी और सामुदायिक ढांचा

बच्चों की देखभाल और संरक्षण के लिए किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 कानूनी आधार प्रदान करता है। यह कानून कानून से संघर्ष में आए बच्चों और देखभाल एवं संरक्षण की जरूरत वाले बच्चों से जुड़े मामलों को समाहित करता है। अधिनियम की धारा 27 प्रत्येक जिले में बाल कल्याण समिति के गठन का प्रावधान करती है।

समेकित बाल विकास सेवा आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से बच्चों को पूरक पोषण और विकास निगरानी जैसी सेवाएं देती है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता समुदाय स्तर पर बच्चों और माताओं तक सेवाएं पहुंचाने में अहम भूमिका निभाते हैं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु का व्यक्ति बच्चा है।
  • अधिनियम की धारा 27 जिले में बाल कल्याण समिति के गठन का प्रावधान करती है।
  • समेकित बाल विकास सेवा में बच्चों के लिए पूरक पोषण और विकास की निगरानी शामिल है।
  • केरलम की योजना में जिला महिला एवं बाल विकास अधिकारियों को बच्चों की सुरक्षा और पुनर्वास की जिम्मेदारी दी गई है।

जोखिम की पहचान से लेकर पुनर्वास के बाद निगरानी तक की यह व्यवस्था विभिन्न विभागों और स्थानीय संस्थाओं के साझा प्रयास पर निर्भर करेगी।

Originally written on October 24, 2026 and last modified on October 24, 2026.

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