नागपट्टिनम में मिलीं चोलकालीन नटराज और शिवकामी की कांस्य प्रतिमाएं
तमिलनाडु के नागपट्टिनम में पुरातात्त्विक खुदाई के दौरान नटराज और शिवकामी की कांस्य-मिश्रधातु से बनी प्रतिमाएं मिली हैं। तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग को ये प्रतिमाएं 30 अक्टूबर 2026 को जमीन से लगभग एक मीटर नीचे उनके आधारों के साथ प्राप्त हुईं। अधिकारियों के अनुसार, विभाग की खुदाई में कांस्य प्रतिमाएं मिलने का यह पहला अवसर है।
प्रतिमाओं की विशेषताएं
नटराज की प्रतिमा 110 सेंटीमीटर ऊंची और 100 सेंटीमीटर चौड़ी है। इसमें चार भुजाओं वाले शिव को आनंद तांडव की मुद्रा में दर्शाया गया है। शिवकामी की प्रतिमा 82 सेंटीमीटर ऊंची और 23 सेंटीमीटर चौड़ी है। इसमें देवी को दो भुजाओं और त्रिभंग मुद्रा में दिखाया गया है। दोनों प्रतिमाओं के साथ उनके आधार भी मिले हैं।
स्कूल शिक्षा एवं पुरातत्व मंत्री राजमोहन ए ने इस खोज की जानकारी दी। प्रतिमाओं की शारीरिक बनावट, मूर्तिकला की शैली और आभूषणों के आधार पर इन्हें 12वीं शताब्दी का माना जा रहा है। यह काल दक्षिण भारत में चोल सत्ता और कला के उत्कर्ष से जुड़ा था।
चोलकालीन कला और नागपट्टिनम का महत्व
चोल काल में नागपट्टिनम एक महत्वपूर्ण बंदरगाह, निर्माण केंद्र और धार्मिक स्थलों का क्षेत्र था। यहां मिली प्रतिमाएं उस समय की धार्मिक परंपराओं और धातु-मूर्तिकला के विकास की जानकारी देती हैं। नटराज की प्रतिमा में शिव का आनंद तांडव सृजन और ब्रह्मांडीय गति से जुड़ी कला-परंपरा को दर्शाता है। शिवकामी की प्रतिमा के साथ इसकी प्राप्ति उस धार्मिक प्रतिमा-समूह की ओर भी संकेत करती है, जिसमें शिव और देवी को साथ प्रतिष्ठित किया जाता था।
संरक्षण और वैज्ञानिक जांच की तैयारी
अधिकारियों ने संभावना जताई है कि आक्रमणों के समय प्रतिमाओं को सुरक्षित रखने के लिए जमीन में दबाया गया होगा। हालांकि, यह अभी एक अनुमान है। प्रतिमाओं को रासायनिक उपचार के लिए चेन्नई ले जाया गया है। आगे इनकी धातु-संरचना जानने के लिए धातुकर्म संबंधी विश्लेषण किया जाएगा। इससे इनके निर्माण में प्रयुक्त सामग्री के बारे में अधिक स्पष्ट जानकारी मिल सकती है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- दक्षिण भारत में चोल काल के दौरान, लगभग 9वीं से 13वीं शताब्दी तक, कांस्य प्रतिमा-निर्माण की परंपरा विशेष रूप से विकसित हुई।
- चोलकालीन नटराज प्रतिमाओं को सामान्यतः कांस्य प्रतिमा कहा जाता है, लेकिन उनमें तांबा प्रमुख घटक हो सकता है और कुछ में पीतल का भी उपयोग होता है।
- चोल नटराज प्रतिमाएं प्रायः मोम-क्षय विधि से बनाई जाती थीं। इसमें मोम के नमूने के आधार पर धातु की प्रतिमा ढाली जाती है।
- आनंद तांडव शिव का उल्लासपूर्ण नृत्य है, जबकि लास्य को कोमल नृत्य-रूप माना जाता है।
नागपट्टिनम की यह खोज चोलकालीन धार्मिक कला और धातु-कौशल के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिक जांच से प्रतिमाओं के निर्माण और उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर और प्रकाश पड़ने की उम्मीद है।