दवाओं की कीमतों पर व्यापक नियंत्रण चाहता सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर-रोधी दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन की सीमा तय करने के केंद्र सरकार के फैसले का दायरा अन्य दवाओं तक बढ़ाने की संभावना पर सवाल उठाया है। केंद्र ने बताया कि इन दवाओं पर अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के 30 प्रतिशत तक मार्जिन सीमित करने से मरीजों को सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है।
दवाओं की कीमतों में अंतर पर अदालत की चिंता
12 अक्टूबर 2026 को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने पूछा कि ऐसी मूल्य-सीमा दूसरी दवाओं पर क्यों लागू नहीं की जा सकती। अदालत ने केंद्र से प्रस्तावित व्यापक उपायों की रूपरेखा पेश करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर 2026 को होगी।
सुनवाई के दौरान पीठ ने कीमतों के बड़े अंतर के उदाहरण रखे। अदालत के अनुसार, 11 रुपये की लागत वाली सलाइन ड्रिप 270 रुपये में बेची जा रही थी। भारत में लगभग 5,000 रुपये में बनने वाले हृदय स्टेंट की अस्पतालों में कीमत 25,000 रुपये से अधिक होने का भी उल्लेख किया गया। एंटीबायोटिक एज़िथ्रोमाइसिन की लागत और बिक्री मूल्य के अंतर पर भी सवाल उठाया गया।
केंद्र की ओर से दलील दी गई कि व्यापारिक मार्जिन दूरदराज के क्षेत्रों में दवाओं की आपूर्ति बनाए रखने में मदद करते हैं। पीठ ने कहा कि मूल्य-नियंत्रित दवाएं मरीजों तक उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है।
भारत में दवा मूल्य नियंत्रण की व्यवस्था
दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने का प्रमुख आधार औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश, 2013 है। यह आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत जारी किया गया है। आदेश की अनुसूची में शामिल दवाओं के लिए अधिकतम सीमा मूल्य तय किया जाता है। औषध विभाग के अंतर्गत राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण इस व्यवस्था को लागू करता है और दवाओं की कीमतें निर्धारित तथा संशोधित करता है।
अनुसूचित दवा का सीमा मूल्य तय करते समय उन ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं के खुदरा विक्रेता मूल्य का साधारण औसत लिया जाता है, जिनकी बाजार हिस्सेदारी कम-से-कम एक प्रतिशत हो। इस औसत में 16 प्रतिशत मार्जिन जोड़ा जाता है। इसके बाद तय कीमत ही एमआरपी की अधिकतम सीमा बनती है।
आवश्यक दवाओं की सूची की भूमिका
राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तैयार करता है। इसके लिए औषधियों पर स्थायी राष्ट्रीय समिति सलाह देती है। सूची की समीक्षा में विश्व स्वास्थ्य संगठन की आवश्यक औषधि सूची, राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों और भारतीय औषध संहिता जैसे स्रोतों पर विचार किया जाता है। वर्ष 2022 की सूची में 388 दवाएं और 900 से अधिक औषधि-रूप शामिल हैं। सूची में शामिल होना और औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश के तहत कीमत नियंत्रित होना भारत की दवा मूल्य व्यवस्था के जुड़े हुए हिस्से हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण को नियंत्रित करने का कानूनी आधार देता है।
- औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश, 2013 इसी अधिनियम के तहत जारी किया गया है।
- राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण की स्थापना 1997 में हुई थी।
- राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची का नवीनतम उल्लेखित संस्करण 2022 में प्रकाशित हुआ था।
अब केंद्र की ओर से पेश की जाने वाली रूपरेखा यह स्पष्ट करेगी कि कैंसर-रोधी दवाओं के बाद मूल्य नियंत्रण का दायरा अन्य दवाओं तक किस तरह बढ़ाया जा सकता है।