तमिलनाडु के वन अधिकार दावों की जांच करेंगे पूर्व सीजेआई गवई
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में वन अधिकारों से जुड़े आदेशों की समीक्षा के लिए पूर्व प्रधान न्यायाधीश भूषण आर. गवई की अध्यक्षता में समिति गठित की है। यह जांच विशेष रूप से अगस्त्यमलाई क्षेत्र के दावों पर केंद्रित होगी। अदालत ने राज्य में वन अधिकार अधिनियम के तहत लंबित दावों की प्रक्रिया समयबद्ध ढंग से पूरी करने के निर्देश भी दिए हैं।
समिति की जिम्मेदारी और अदालत की निगरानी
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने इस समिति में केंद्रीय अधिकारप्राप्त समिति के एक अधिकारी और तमिलनाडु के प्रधान मुख्य वन संरक्षक को भी शामिल किया है। समिति को राज्य में दावों पर जारी आदेशों की समीक्षा करनी होगी। वह संबंधित अधिकारियों को दावों की प्रक्रिया तेज करने के निर्देश दे सकती है।
राज्य को शेष ग्राम सभाओं का गठन 30 दिनों के भीतर करना है। ग्राम सभाओं के गठन के बाद पांच महीने के भीतर दावों को आमंत्रित करने और कानून में निर्धारित तीन-स्तरीय प्रक्रिया के जरिए उनका निपटारा पूरा करना होगा। इसके बाद समिति को दो महीने में आदेशों की समीक्षा करनी है। राज्य को हर महीने प्रगति रिपोर्ट देनी होगी और समिति अपनी अंतिम रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को सौंपेगी। अगली सुनवाई 1 फरवरी 2027 को होगी, जिसमें अंतरिम स्थिति रिपोर्ट पर विचार किया जाएगा।
दावेदारों और रेशम कपास की खेती पर सवाल
पीठ ने राज्य को वैधानिक प्रक्रिया शुरू करने में कई वर्षों की देरी के लिए फटकार लगाई। अदालत के अनुसार, 2016 में रोक हटने के बाद भी प्रक्रिया शुरू नहीं की गई थी। राज्य ने 5,072.64 हेक्टेयर क्षेत्र में रह रहे 4,594 लोगों की पहचान की है। इनमें से 2,643 लोग 3,637.83 हेक्टेयर में रेशम कपास उगा रहे थे।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल खेती करने से कोई व्यक्ति वनवासी अनुसूचित जनजाति या अन्य पारंपरिक वनवासी का दर्जा पाने का पात्र नहीं हो जाता। इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो अस्थायी रूप से जंगल में रहकर खेती करते हैं, या वन सीमा से बाहर रहते हुए जंगल के भीतर खेती करते हैं। पीठ ने व्यावसायिक रूप से उगाई गई रेशम कपास को लघु वनोपज मानने से भी इनकार किया। कानून के तहत लघु वनोपज का अधिकार परंपरागत रूप से एकत्र किए जाने वाले वन उत्पादों से जुड़ा है, न कि व्यावसायिक खेती से।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय अधिकारप्राप्त समिति से यह भी जांचने को कहा है कि बाहरी लोगों की खेती को किसने वित्तपोषित किया या उसमें मदद की। इससे यह स्पष्ट करने में मदद मिलेगी कि दावों के पीछे वन परंपरागत निर्भरता है या खेती के लिए किया गया नया हस्तक्षेप।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- वन अधिकार अधिनियम के तहत ग्राम सभा दावों की जांच कर सिफारिश करती है; इसके बाद उप-मंडल और जिला स्तर पर उनकी जांच तथा स्वीकृति होती है।
- अन्य पारंपरिक वनवासी का दर्जा पाने के लिए कम से कम 75 वर्ष से वन में निवास और आजीविका के लिए वन पर निर्भरता आवश्यक है।
- अधिनियम के तहत अधिकार उसी भूमि पर मिल सकते हैं, जिस पर परिवार 13 दिसंबर 2005 को खेती कर रहा था; इसकी सीमा अधिकतम चार हेक्टेयर है।
- लघु वनोपज के अधिकार परंपरागत रूप से एकत्र किए जाने वाले गैर-काष्ठ वन उत्पादों से संबंधित हैं।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी से तमिलनाडु में लंबित दावों की समयसीमा और पात्रता की जांच, दोनों पर जोर बढ़ा है।