एसएनडीपी माइक्रोफाइनेंस मामले में जांच का रास्ता साफ, आरोपों पर फैसला बाकी
केरल उच्च न्यायालय ने 15.85 करोड़ रुपये के कथित एसएनडीपी माइक्रोफाइनेंस घोटाले में आरोपियों के खिलाफ आगे बढ़ने के लिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अभियोजन की पूर्व मंजूरी को जरूरी नहीं माना। न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन ने 6 नवंबर 2026 को विशेष जांच दल से जांच कराने की मांग वाली याचिकाओं पर अंतरिम आदेश देते हुए सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को दो सप्ताह के भीतर आरोपपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि और आरोप
यह मामला केरल राज्य पिछड़ा वर्ग विकास निगम की माइक्रोफाइनेंस योजना के तहत एसएनडीपी योगम को दिए गए ऋणों में कथित अनियमितताओं से जुड़ा है। सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने वर्ष 2016 में ऋण राशि के कथित दुरुपयोग को लेकर मामला दर्ज किया था। आरोपियों में एसएनडीपी योगम के महासचिव वेल्लापल्ली नटेसन और निगम के पूर्व प्रबंध निदेशक शामिल हैं।
मामले में जांच एजेंसी और राज्य सरकार की दलीलें अलग-अलग थीं। जांच ब्यूरो का कहना था कि आरोपी लोक सेवक की श्रेणी में आते हैं और उनके विरुद्ध अभियोजन के लिए सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी आवश्यक है। राज्य का पक्ष था कि एसएनडीपी योगम पिछड़ा वर्ग विकास विभाग की नोडल एजेंसी नहीं थी और अधिनियम के तहत लोक सेवक की परिभाषा में नहीं आती। न्यायालय ने फिलहाल अभियोजन मंजूरी के प्रश्न पर आगे की कार्यवाही का रास्ता खुला रखा और आरोपपत्र दाखिल करने को कहा।
धारा 19 और अभियोजन मंजूरी का दायरा
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 19 के तहत कुछ अपराधों में लोक सेवक के विरुद्ध अदालत द्वारा संज्ञान लेने से पहले सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी जरूरी होती है। यह प्रावधान अपने आप में जांच शुरू करने पर रोक नहीं लगाता। इसलिए अभियोजन की मंजूरी और जांच के लिए जरूरी स्वीकृति को एक ही प्रक्रिया नहीं समझना चाहिए।
अधिनियम की धारा 17क सरकारी निर्णयों या आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़े कथित अपराधों की जांच या पूछताछ से पहले सरकार अथवा सक्षम प्राधिकारी की अनुमति का अलग प्रावधान करती है। मौके पर रिश्वत लेते हुए पकड़े जाने जैसे मामलों के लिए इसमें अपवाद है। इस मामले में उच्च न्यायालय का अंतरिम आदेश आरोपों की सत्यता पर कोई निष्कर्ष नहीं है; उनका परीक्षण आगे मुकदमे में होगा। अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को सूचीबद्ध है।
न्यायालय के आदेश का तात्कालिक असर
दो सप्ताह में आरोपपत्र दाखिल करने के निर्देश से मामला जांच के बाद न्यायिक प्रक्रिया के अगले चरण की ओर बढ़ेगा। हालांकि, आरोपपत्र दाखिल होना दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से आरोपों के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी है। ऐसे मामलों में अदालत का संज्ञान, जांच की अनुमति और मुकदमे में दोष का निर्धारण अलग-अलग कानूनी चरण होते हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 में लोक सेवकों से जुड़े भ्रष्टाचार के अपराधों के लिए कानूनी प्रावधान हैं।
- धारा 19 कुछ अपराधों में अदालत द्वारा संज्ञान लेने से पहले सक्षम प्राधिकारी की अभियोजन मंजूरी से संबंधित है।
- धारा 17क आधिकारिक निर्णयों से जुड़े कथित अपराधों की जांच या पूछताछ के लिए पूर्व अनुमति का अलग प्रावधान करती है।
- धारा 19 के तहत सक्षम प्राधिकारी सामान्यतः वह सरकार या प्राधिकरण होता है जिसे संबंधित लोक सेवक को पद से हटाने का अधिकार हो।
इस अंतरिम आदेश से जांच और अभियोजन की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, लेकिन आरोपियों की जिम्मेदारी का अंतिम निर्णय मुकदमे के दौरान साक्ष्यों के आधार पर ही होगा।