झारखंड के पारंपरिक मंदर को मिला जीआई टैग, सांस्कृतिक पहचान को नई मजबूती

झारखंड के पारंपरिक मंदर को मिला जीआई टैग, सांस्कृतिक पहचान को नई मजबूती

झारखंड के पारंपरिक लोक वाद्य मंदर को भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग मिल गया है। यह मान्यता न केवल इस वाद्य की विशिष्ट बनावट और पारंपरिक निर्माण पद्धति को दर्ज करती है, बल्कि झारखंड की जनजातीय और लोक सांस्कृतिक विरासत को भी औपचारिक संरक्षण देती है।

मंदर की सांस्कृतिक पहचान

मंदर झारखंड का एक प्रसिद्ध ताल वाद्य है, जिसका उपयोग लोक संगीत और जनजातीय सांस्कृतिक परंपराओं में होता रहा है। इसका शरीर बेलनाकार होता है और इसे लाल मिट्टी से बनाया जाता है। दोनों सिरों पर अलग-अलग आकार के चमड़े से ढके मुख होते हैं, जो इसकी ध्वनि और उपयोग की शैली को विशिष्ट बनाते हैं।

यह वाद्य केवल संगीत का साधन नहीं, बल्कि सामुदायिक उत्सवों, नृत्य-परंपराओं और लोक अनुष्ठानों से जुड़ी सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा भी है। इसी कारण इसे झारखंड की पहचान से जोड़कर देखा जाता है।

जीआई टैग क्यों अहम है

भौगोलिक संकेतक टैग उन उत्पादों को दिया जाता है जिनकी विशेषता, प्रतिष्ठा या गुणवत्ता किसी खास भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती है। यह बौद्धिक संपदा अधिकार का एक रूप है, जो पारंपरिक उत्पादों को कानूनी संरक्षण देता है। भारत में जीआई पंजीकरण भौगोलिक संकेतक (वस्तुओं का पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 के तहत होता है और इसका रजिस्ट्रेशन चेन्नई स्थित कार्यालय से संचालित किया जाता है।

मंदर को जीआई टैग मिलने से इसके नाम और निर्माण पर कानूनी पहचान मजबूत होगी। इससे पारंपरिक कारीगरों और उत्पादकों को भी बाजार में अलग पहचान मिल सकती है।

आवेदन, दस्तावेज और ऐतिहासिक आधार

मंदर के लिए जीआई आवेदन 24 सितंबर 2021 को राइदिह मंदर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड, जरजट्टा गांव, गुमला जिले की ओर से दाखिल किया गया था। अंतिम सुनवाई जनवरी 2025 में दिल्ली में हुई। आवेदन में कारीगरी, स्थानीय लाल मिट्टी, पारंपरिक निर्माण विधियों और 1915 तक के अभिलेखीय संदर्भों को शामिल किया गया था।

इस दावे को मजबूत करने के लिए सरत चंद्र रॉय, तारक चंद्र दास और डब्ल्यू.जी. आर्चर के कार्यों का भी उल्लेख किया गया। साथ ही पटना संग्रहालय और बिहार जिला गजेटियर से जुड़े अभिलेखीय स्रोतों का सहारा लिया गया।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • जीआई टैग किसी उत्पाद को उसके भौगोलिक मूल और पारंपरिक विशेषताओं के आधार पर कानूनी पहचान देता है।
  • भारत में जीआई रजिस्ट्रेशन का कार्यालय चेन्नई में स्थित है।
  • झारखंड के अन्य जीआई-मान्यता प्राप्त उत्पादों में सोहराई-खोवर पेंटिंग और कोडरमा की केसरिया कलाकंद शामिल हैं।
  • मंदर झारखंड की जनजातीय और लोक सांस्कृतिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा पारंपरिक वाद्य है।

जीआई टैग मिलने के बाद मंदर अब केवल एक लोक वाद्य नहीं, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक विरासत का संरक्षित प्रतीक भी बन गया है। यह पहचान पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय कारीगरी और क्षेत्रीय अस्मिता को एक साथ सशक्त करती है।

Originally written on September 30, 2026 and last modified on September 30, 2026.

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