जापान के किकाइ काल्डेरा के नीचे नया मैग्मा जमा होने के संकेत

जापान के किकाइ काल्डेरा के नीचे नया मैग्मा जमा होने के संकेत

जापान के दक्षिण में समुद्र के भीतर स्थित किकाइ काल्डेरा के नीचे मैग्मा धीरे-धीरे जमा हो रहा है। कोबे विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 23 अक्टूबर 2026 को इस निष्कर्ष से जुड़े प्रमाण साझा किए। अध्ययन के अनुसार, यह मैग्मा लगभग 7,300 वर्ष पहले हुए प्राचीन ज्वालामुखीय विस्फोट का बचा हुआ पिघला पदार्थ नहीं, बल्कि बाद में नीचे से आया नया मैग्मा है। शोधकर्ता इसे हजारों वर्षों में चलने वाली धीमी प्रक्रिया मानते हैं; निष्कर्षों से निकट भविष्य में विस्फोट होने का संकेत नहीं मिलता।

प्राचीन विस्फोट से बना काल्डेरा

काल्डेरा ज्वालामुखी के आसपास की जमीन या उसके शिखर के धँसने से बना बड़ा गड्ढेनुमा भू-आकार होता है। सामान्यतः बड़े विस्फोट के दौरान ज्वालामुखी के भीतर से भारी मात्रा में मैग्मा निकलने के बाद ऊपर की संरचना ढह जाती है। किकाइ काल्डेरा का निर्माण किकाइ-अकाहोया विस्फोट के बाद हुआ था। होलोसीन युग के सबसे बड़े ज्वालामुखीय विस्फोटों में गिने जाने वाले इस विस्फोट ने दक्षिणी जापान में व्यापक ज्वालामुखीय जमाव बनाए। मौजूदा अध्ययन का केंद्र यह समझना था कि इतने लंबे समय बाद काल्डेरा के नीचे क्या बदलाव हो रहे हैं।

समुद्रतल के नीचे मैग्मा की पहचान

कोबे विश्वविद्यालय के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने जापान समुद्र-विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी एजेंसी के साथ मिलकर समुद्र के नीचे की संरचना का अध्ययन किया। जहाज से किए गए सर्वेक्षण में समुद्रतल पर भूकंपीय मापक यंत्र लगाए गए और ध्वनि संकेत बनाने वाली वायु-बंदूक प्रणाली का उपयोग किया गया। इन संकेतों के लौटने के ढंग से वैज्ञानिकों ने समुद्रतल के नीचे की चट्टानों और अन्य संरचनाओं की तस्वीर तैयार की। सर्वेक्षण में काल्डेरा के केंद्रीय लावा गुंबद के ठीक नीचे, लगभग 2.5 से 6 किलोमीटर की गहराई पर मैग्मा का एक बड़ा भंडार पाया गया। यह भंडार प्राचीन विस्फोट के बाद से मैग्मा जमा होने का प्रमाण देता है।

लावा गुंबद से मिली मैग्मा के स्रोत की जानकारी

किकाइ के मध्य में स्थित लावा गुंबद लगभग 3,900 वर्षों से बन रहा है। शोधकर्ताओं ने गुंबद के लावा की रासायनिक संरचना का विश्लेषण किया। इसके आधार पर उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि लावा का संबंध नए मैग्मा के प्रवाह से है, न कि 7,300 वर्ष पुराने विस्फोट के बचे हुए पदार्थ से। अध्ययन का नेतृत्व अकिहिरो नागाया ने किया और इसके निष्कर्ष ‘कम्युनिकेशन्स अर्थ एंड एनवायरनमेंट’ में प्रकाशित हुए। शोध का महत्व यह है कि इससे समुद्र के नीचे छिपे ज्वालामुखीय तंत्र और लंबे समय में होने वाली मैग्मा पुनःपूर्ति को समझने में मदद मिलती है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • काल्डेरा बड़े विस्फोट के बाद मैग्मा निकलने और जमीन धँसने से बनने वाला विशाल ज्वालामुखीय अवसाद है।

  • किकाइ-अकाहोया विस्फोट लगभग 7,300 वर्ष पहले हुआ था और यह होलोसीन युग के बड़े विस्फोटों में शामिल है।

  • किकाइ काल्डेरा के नीचे पहचाना गया मैग्मा भंडार समुद्रतल से लगभग 2.5–6 किलोमीटर की गहराई पर है।

  • समुद्रतल पर लगाए गए भूकंपीय मापक यंत्रों से प्राप्त तरंगों के आधार पर समुद्र के नीचे की भू-संरचना का अध्ययन किया जाता है।

किकाइ में मैग्मा का जमा होना दीर्घकालिक भूगर्भीय बदलाव का संकेत है, तत्काल ज्वालामुखीय खतरे का नहीं। जापान के ज्वालामुखीय क्षेत्रों की निगरानी और उनके भीतर चल रही प्रक्रियाओं को समझने के लिए ऐसे अध्ययन उपयोगी हैं।

Originally written on October 24, 2026 and last modified on October 24, 2026.

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