चीर तीतर संरक्षण में हिमाचल की उल्लेखनीय कामयाबी
हिमाचल प्रदेश में चीर तीतर संरक्षण कार्यक्रम के तहत जंगल में छोड़े गए पक्षियों की जीवित रहने की दर 2019–20 के 11.11 प्रतिशत से बढ़कर 2024–25 में 100 प्रतिशत दर्ज की गई। वन्यजीव सप्ताह के दौरान अक्टूबर 2026 में शिमला जिले के कोटी के पास बंदी प्रजनन में पाले गए 12 पक्षियों को प्राकृतिक आवास में छोड़ा गया।
जीवित रहने की दर में बड़ा सुधार
हिमाचल प्रदेश का यह कार्यक्रम चीर तीतर को उसके प्राकृतिक आवास में फिर से स्थापित करने पर केंद्रित है। वर्ष 2024–25 में दर्ज 100 प्रतिशत जीवित रहने की दर, 2019–20 के शुरुआती 11.11 प्रतिशत के मुकाबले उल्लेखनीय सुधार है। हालांकि, यह आंकड़ा छोड़े गए पक्षियों के उस समूह से संबंधित है; इसे पूरी जंगली आबादी की स्थिति का माप नहीं माना जाना चाहिए।
अक्टूबर 2026 में छोड़े गए समूह में दो नर, दो मादा और आठ बच्चे शामिल थे। इससे पहले कार्यक्रम के तहत कुल 77 बंदी-प्रजनित पक्षियों को जंगल में छोड़ा जा चुका था। वर्ष 2025–26 में कोई पक्षी नहीं छोड़ा गया, क्योंकि उस अवधि को मौजूदा आबादी को मजबूत करने के लिए रखा गया था।
पालन और निगरानी की चरणबद्ध व्यवस्था
सोलन जिले के चायल स्थित खड़ियूं चीर तीतर प्रजनन केंद्र इस प्रजाति के संरक्षण-प्रजनन के लिए समर्पित भारत के चुनिंदा केंद्रों में से एक है। इसका संचालन हिमाचल प्रदेश चिड़ियाघर संरक्षण एवं प्रजनन सोसायटी करती है। केंद्र में चूजों को उनके माता-पिता के साथ पालने की पद्धति अपनाई जाती है। इसके बाद पक्षियों को एकदम खुले जंगल में छोड़ने के बजाय धीरे-धीरे प्राकृतिक वातावरण का अभ्यस्त कराया जाता है। इस प्रक्रिया को नरम रिहाई कहा जाता है।
रिहाई के बाद पक्षियों की निगरानी रेडियो ट्रांसमीटर और कैमरा ट्रैप की मदद से की जाती है। इससे उनके आवागमन और जंगल में टिके रहने की जानकारी जुटाने में मदद मिलती है। चरणबद्ध रिहाई और निगरानी, संरक्षण कार्यक्रम में पक्षियों के अनुकूलन का आकलन करने के लिए उपयोगी हैं।
घासभूमि और आवास पर बढ़ता दबाव
चीर तीतर पश्चिमी हिमालय की प्रजाति है और इसके अस्तित्व के लिए घासभूमि का आवास अहम है। जंगल में आग की बढ़ती घटनाओं से जुड़ा आवास क्षरण इसकी प्रमुख चुनौतियों में शामिल है। शिकार, चराई और चारे के लिए वनस्पति संग्रह भी पक्षियों तथा उनके आवास पर दबाव डालते हैं। इसलिए केवल पक्षियों को छोड़ना पर्याप्त नहीं; उनके आवास की सुरक्षा और रिहाई के बाद निगरानी भी जरूरी है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- चीर तीतर को स्थानीय रूप से चिर तीतर कहा जाता है।
- आईयूसीएन की लाल सूची में इसकी स्थिति ‘असुरक्षित’ है।
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची एक में इसे सर्वोच्च कानूनी संरक्षण प्राप्त है।
- खड़ियूं प्रजनन केंद्र चायल, सोलन जिले में है; 2026 में पक्षियों को शिमला जिले के कोटी के पास छोड़ा गया।
हिमाचल का अनुभव बताता है कि संरक्षण-प्रजनन के साथ सावधानीपूर्वक रिहाई, निरंतर निगरानी और घासभूमि की रक्षा को जोड़ना चीर तीतर के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है।