चीर तीतर संरक्षण में हिमाचल की बड़ी सफलता

चीर तीतर संरक्षण में हिमाचल की बड़ी सफलता

हिमाचल प्रदेश में चीर तीतर के पुनर्वास कार्यक्रम के तहत वर्ष 2024–25 में छोड़े गए पक्षियों की जीवित रहने की दर 100 प्रतिशत दर्ज की गई। वर्ष 2019–20 में यह दर 11.11 प्रतिशत थी। वन्यजीव सप्ताह के दौरान अक्टूबर 2026 में शिमला जिले के कोटी क्षेत्र के पास 12 बंदी प्रजनन से तैयार पक्षियों को चरणबद्ध तरीके से जंगल में छोड़ा गया।

चीर तीतर और उसके संरक्षण का महत्व

चीर तीतर, जिसे हिमाचल प्रदेश में ‘चिर तीतर’ कहा जाता है, पहाड़ी घासभूमियों से जुड़ी एक पक्षी प्रजाति है। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ की लाल सूची में इसे ‘संकट के निकट’ श्रेणी में रखा गया है। भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के तहत इसे संरक्षण प्राप्त है।

इस प्रजाति का संरक्षण उसके उपयुक्त घासभूमि आवास को बचाने से जुड़ा है। जंगलों में आग, पशुओं की चराई और चारे के लिए घास एकत्र करने से घासभूमियों पर दबाव पड़ता है। इससे चीर तीतर के लिए उपलब्ध आवास घट सकता है। इसलिए पक्षियों को जंगल में छोड़ने के साथ उनके प्राकृतिक ठिकानों की स्थिति पर ध्यान देना भी जरूरी है।

बंदी प्रजनन से जंगल में पुनर्वास तक

राज्य का पुनर्वास कार्यक्रम सोलन जिले के चायल स्थित खड़ियूं चीर तीतर प्रजनन केंद्र से संचालित होता है। केंद्र ने अब तक बंदी प्रजनन से तैयार 77 पक्षियों को जंगल में छोड़ा है। अक्टूबर 2026 तक यहां 58 वयस्क चीर तीतर थे, जिनमें 23 नर और 35 मादा शामिल थीं।

कार्यक्रम में पक्षियों का पालन उनके माता-पिता से कराने, धीरे-धीरे प्राकृतिक वातावरण के अनुकूल बनाने और जंगल में छोड़ने के बाद निगरानी करने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। रेडियो संकेतक और कैमरा ट्रैप के माध्यम से छोड़े गए पक्षियों की गतिविधियों पर नजर रखी जाती है। वन्यजीव विभाग ने 2025–26 को आबादी के स्थिरीकरण के लिए निर्धारित किया था, इसलिए उस वर्ष कोई पक्षी जंगल में नहीं छोड़ा गया।

तीसरे स्थल पर छोड़े गए पक्षी

अक्टूबर 2026 में शिमला जिले के कोटी क्षेत्र के मोई जुब्बर में पक्षियों को छोड़ने के साथ राज्य के कार्यक्रम को तीसरा पुनर्वास स्थल मिला। इस अवसर पर छोड़े गए 12 पक्षियों में दो नर, दो मादा और आठ चूजे थे। इस तरह के नए स्थल कार्यक्रम के दायरे को बढ़ाते हैं, जबकि हर स्थल पर पक्षियों का अनुकूलन और जीवित रहना निगरानी का अहम हिस्सा बना रहता है।

जीवित रहने की दर का आकलन केवल पक्षियों की मृत्यु के रिकॉर्ड से नहीं, बल्कि निगरानी के आंकड़ों और जंगल में उनके अनुकूलन के प्रमाणों से भी किया जाता है। उप वन संरक्षक डॉ. शहनवाज अहमद भट ने इन पहलुओं को पुनर्वास के परिणामों के आकलन में महत्वपूर्ण बताया।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • चीर तीतर को हिमाचल प्रदेश में ‘चिर तीतर’ कहा जाता है।
  • अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ की लाल सूची में यह ‘संकट के निकट’ श्रेणी में है।
  • भारत में चीर तीतर वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I में शामिल है।
  • खड़ियूं चीर तीतर प्रजनन केंद्र चायल, सोलन जिले में स्थित है।

हिमाचल में बेहतर जीवित रहने की दर और तीसरे पुनर्वास स्थल का जुड़ना संरक्षण कार्यक्रम के लिए सकारात्मक संकेत हैं। इसकी दीर्घकालीन सफलता घासभूमियों की रक्षा और लगातार निगरानी पर निर्भर करेगी।

Originally written on October 27, 2026 and last modified on October 27, 2026.

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