गुवाहाटी में उल्लुओं की आठ प्रजातियां दर्ज, शहरी हरित क्षेत्रों का महत्व बढ़ा

गुवाहाटी में उल्लुओं की आठ प्रजातियां दर्ज, शहरी हरित क्षेत्रों का महत्व बढ़ा

असम के गुवाहाटी में नवंबर 2023 से जुलाई 2025 तक किए गए सर्वेक्षण में उल्लुओं की आठ प्रजातियां दर्ज की गईं। अध्ययन के निष्कर्ष शोध पत्रिका अर्बन इकोसिस्टम्स में प्रकाशित हुए। असम के वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री जयंत मल्ल बरुआ ने 28 अक्टूबर 2026 को इन निष्कर्षों की जानकारी दी।

सर्वेक्षण में मिली उल्लुओं की विविधता

शोधकर्ताओं ने गुवाहाटी को एक-एक वर्ग किलोमीटर के 33 ग्रिड खंडों में बांटकर सर्वेक्षण किया। इनमें से 24 खंडों में उल्लुओं की मौजूदगी दर्ज हुई। बार्न आउल और स्पॉटेड आउलेट सबसे अधिक बार देखे या सुने गए। इनके अलावा ब्राउन हॉक आउल, ब्राउन फिश आउल, कॉलर्ड स्कॉप्स आउल, माउंटेन स्कॉप्स आउल, ओरिएंटल स्कॉप्स आउल और एशियन बैरेड आउलेट भी दर्ज किए गए।

उल्लू पक्षियों के स्ट्रिगिफॉर्मीस गण में आते हैं। इस गण में जीवित उल्लुओं के दो परिवार—टायटोनिडी और स्ट्रिगिडी—शामिल हैं। अधिकांश उल्लू रात में सक्रिय होते हैं, हालांकि अलग-अलग प्रजातियों की सक्रियता का समय भिन्न हो सकता है।

शहरी शोर से सर्वेक्षण में चुनौती

गुवाहाटी के सर्वेक्षण में उल्लुओं की मौजूदगी दर्ज करने के लिए ग्रिड-आधारित तरीका अपनाया गया। लेकिन शहरों में यातायात और अन्य पृष्ठभूमि शोर उल्लुओं की आवाज को दबा सकते हैं। इससे सर्वेक्षण के दौरान किसी पक्षी का पता लगने की संभावना घट जाती है। इसलिए किसी जगह पर उल्लू दर्ज न होना इस बात का पक्का प्रमाण नहीं है कि वहां वह मौजूद ही नहीं है।

वन्यजीव निगरानी में इस पहचान-संबंधी सीमा को ध्यान में रखने से आबादी और प्रजातियों के वितरण का अधिक विश्वसनीय आकलन किया जा सकता है। नियमित और दीर्घकालीन सर्वेक्षण इस काम में उपयोगी हैं।

शहरी विकास में आवास संरक्षण की जरूरत

उल्लू कृंतकों का शिकार करते हैं और इस तरह उनकी संख्या के प्राकृतिक नियंत्रण में योगदान देते हैं। अध्ययन में मौजूदा वनस्पति, आर्द्रभूमि, पुराने पेड़ों और हरित क्षेत्रों को उल्लुओं के लिए महत्वपूर्ण आवासीय विशेषताओं के रूप में रेखांकित किया गया। शहर के विस्तार के बीच इन क्षेत्रों का संरक्षण और दीर्घकालीन वन्यजीव निगरानी साथ-साथ चलनी चाहिए। शोर प्रदूषण को भी शहरी वन्यजीव नियोजन में ध्यान में रखना जरूरी है, क्योंकि यह रात में सक्रिय पक्षियों की आवाज और उनके सर्वेक्षण को प्रभावित कर सकता है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • उल्लू पक्षियों के स्ट्रिगिफॉर्मीस गण में आते हैं।
  • गुवाहाटी अध्ययन में बार्न आउल और स्पॉटेड आउलेट सबसे अधिक दर्ज किए गए।
  • सर्वेक्षण में 33 में से 24 एक-वर्ग-किलोमीटर ग्रिड खंडों में उल्लू मिले।
  • यातायात सहित शहरी पृष्ठभूमि शोर उल्लुओं की आवाज को दबा सकता है।

गुवाहाटी का यह अध्ययन दिखाता है कि शहरों में जैव विविधता को समझने के लिए आवासों की रक्षा के साथ सर्वेक्षण की सीमाओं और शोर के प्रभाव को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

Originally written on October 29, 2026 and last modified on October 29, 2026.

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