जैव विविधता संरक्षण पर भारत का वैश्विक संकल्प

जैव विविधता संरक्षण पर भारत का वैश्विक संकल्प

आर्मेनिया की राजधानी येरेवान में 19 से 30 अक्टूबर 2026 तक जैव विविधता अभिसमय के पक्षकारों का 17वां सम्मेलन आयोजित हो रहा है। 27 अक्टूबर को केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने उच्चस्तरीय सत्र में भारत का राष्ट्रीय वक्तव्य प्रस्तुत किया। इसमें भारत ने जैव विविधता संरक्षण और कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा के क्रियान्वयन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

वैश्विक जैव विविधता लक्ष्य और भारत की भूमिका

जैव विविधता अभिसमय 1992 में रियो डी जेनेरियो में आयोजित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण एवं विकास सम्मेलन में अपनाई गई बहुपक्षीय संधि है। यह 1993 में लागू हुई। इसके तीन प्रमुख उद्देश्य हैं—जैव विविधता का संरक्षण, उसके घटकों का सतत उपयोग तथा आनुवंशिक संसाधनों से मिलने वाले लाभों का न्यायसंगत बंटवारा। इसके पक्षकारों का सम्मेलन इस संधि का संचालन करने वाली संस्था है।

दिसंबर 2022 में कनाडा के मॉन्ट्रियल में हुए 15वें सम्मेलन में कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा अपनाई गई थी। इसमें 2050 के लिए चार दीर्घकालिक लक्ष्य और 2030 तक हासिल किए जाने वाले 23 लक्ष्य हैं। भारत का कहना है कि इन लक्ष्यों को लागू करते समय देशों की प्राथमिकताओं, परिस्थितियों और राष्ट्रीय कानूनों का ध्यान रखा जाना चाहिए।

राष्ट्रीय योजना और वित्तीय सहयोग की मांग

भारत ने अपनी अद्यतन राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति एवं कार्ययोजना के जरिए वैश्विक रूपरेखा को देश के संदर्भ में लागू करने की दिशा तय की है। इस योजना में 23 राष्ट्रीय जैव विविधता लक्ष्य और उनकी प्रगति मापने के लिए 142 संकेतक शामिल हैं।

भारत ने विकसित देशों से वैश्विक जैव विविधता लक्ष्यों के क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त और अनुमानित वित्तीय सहायता, क्षमता निर्माण तथा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की जरूरत पर जोर दिया। आनुवंशिक संसाधनों से जुड़ी डिजिटल अनुक्रम जानकारी के उपयोग से होने वाले लाभों को बहुपक्षीय व्यवस्थाओं के माध्यम से साझा करने का भी भारत समर्थन करता है। इस व्यवस्था से जुड़ी काली निधि का उद्देश्य लाभ-साझाकरण को आगे बढ़ाना है।

संरक्षित क्षेत्र और जैव सुरक्षा

भारत ने कृत्रिम जीव विज्ञान और जैव सुरक्षा के मामलों में विज्ञान-आधारित, जोखिम के अनुपात में और एहतियाती दृष्टिकोण अपनाने की पैरवी की। 27 अक्टूबर 2026 तक देश में 1,134 संरक्षित क्षेत्र, 103 रामसर स्थल, 57 जैव विविधता विरासत स्थल और 18 जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र थे। इनमें से 13 जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र यूनेस्को के मानव एवं जैवमंडल कार्यक्रम का हिस्सा हैं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • जैव विविधता अभिसमय पर 1992 के रियो पृथ्वी सम्मेलन में हस्ताक्षर के लिए सहमति बनी और यह 29 दिसंबर 1993 को लागू हुआ।
  • कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा दिसंबर 2022 में सीबीडी के 15वें सम्मेलन में अपनाई गई।
  • इस रूपरेखा का 2030 का एक प्रमुख लक्ष्य स्थलीय, अंतर्देशीय जल, तटीय और समुद्री क्षेत्रों के कम-से-कम 30 प्रतिशत का संरक्षण करना है।
  • रामसर अभिसमय आर्द्रभूमियों के संरक्षण और उनके विवेकपूर्ण उपयोग से संबंधित अंतरराष्ट्रीय संधि है।

भारत का वक्तव्य वैश्विक जैव विविधता लक्ष्यों को राष्ट्रीय योजनाओं से जोड़ने और उनके लिए वित्तीय तथा तकनीकी सहयोग सुनिश्चित करने पर केंद्रित रहा।

Originally written on October 28, 2026 and last modified on October 28, 2026.

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