कोयला बिजली संयंत्रों पर सरकार का सख्त निर्देश, आपूर्ति बढ़ाने की तैयारी
देश में बिजली मांग बढ़ने और कोयला भंडार पर दबाव के बीच केंद्र सरकार ने 50 मेगावाट या उससे अधिक क्षमता वाले 100 से ज्यादा कैप्टिव कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को 1 अक्टूबर से 31 दिसंबर 2026 तक अधिकतम उत्पादन करने का निर्देश दिया है। यह कदम बिजली आपूर्ति को स्थिर रखने, ग्रिड पर दबाव कम करने और संभावित कमी से निपटने के लिए उठाया गया है।
क्यों लिया गया यह फैसला
ऊर्जा मंत्रालय ने यह आदेश बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 11 के तहत जारी किया है, जो असाधारण परिस्थितियों में सरकार को उत्पादन इकाइयों को संचालन जारी रखने या बढ़ाने का निर्देश देने की शक्ति देती है। इस बार आदेश के पीछे कई कारण हैं—बिजली की बढ़ती मांग, सामान्य से अधिक गर्म मौसम की आशंका, और सिंचाई के लिए अतिरिक्त बिजली जरूरत।
सरकारी आकलन के अनुसार, 19 सितंबर 2026 तक देश के करीब 40 प्रतिशत कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में ईंधन भंडार गंभीर रूप से कम था। कुछ संयंत्रों के पास तीन दिन से भी कम का कोयला बचा था। ऐसे माहौल में कैप्टिव संयंत्रों से अधिक उत्पादन कराना आपूर्ति संतुलन बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
कैप्टिव पावर प्लांट क्या होते हैं
कैप्टिव पावर प्लांट वे बिजली उत्पादन इकाइयाँ होती हैं, जिन्हें मुख्य रूप से किसी औद्योगिक इकाई की अपनी जरूरतों के लिए लगाया जाता है। इनका उपयोग खुले बाजार में बिजली बेचने के बजाय मालिक या उससे जुड़ी फैक्ट्री की खपत पूरी करने के लिए होता है। भारत में ऐसे संयंत्र एल्यूमिनियम स्मेल्टर, इस्पात कारखानों, सीमेंट उद्योग, तेल रिफाइनरियों और अन्य बड़े औद्योगिक उपभोक्ताओं द्वारा चलाए जाते हैं।
नए निर्देश के तहत यदि इन संयंत्रों में अतिरिक्त बिजली बचती है, तो उसे पावर एक्सचेंज के जरिए बेचना होगा। साथ ही, उन्हें अपनी उत्पादन, खपत, बिक्री, क्षमता और कोयला भंडार की साप्ताहिक रिपोर्ट केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण को देनी होगी।
बिजली व्यवस्था पर इसका असर
यह कदम ऐसे समय आया है जब देश की बिजली व्यवस्था में कोयला आधारित संयंत्र अब भी बेसलोड बिजली का बड़ा स्रोत हैं। यानी जब नवीकरणीय स्रोतों से उत्पादन कम होता है या मांग अचानक बढ़ती है, तब यही संयंत्र स्थिर आपूर्ति का आधार बनते हैं।
सरकार का यह निर्देश केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करना भी है। पावर एक्सचेंज के जरिए अतिरिक्त बिजली की बिक्री से बाजार में अल्पकालिक आपूर्ति बढ़ सकती है और औद्योगिक उपभोक्ताओं को भी राहत मिल सकती है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 11 सरकार को असाधारण परिस्थितियों में उत्पादन इकाइयों को संचालन संबंधी निर्देश देने की शक्ति देती है।
- कैप्टिव पावर प्लांट मुख्य रूप से किसी उद्योग की अपनी बिजली जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाए जाते हैं।
- केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण, विद्युत मंत्रालय के अधीन एक वैधानिक निकाय है।
- भारत में पावर एक्सचेंज अल्पकालिक बिजली व्यापार के लिए मंच उपलब्ध कराते हैं।
कुल मिलाकर, यह फैसला बिजली आपूर्ति को लेकर सरकार की सतर्कता दिखाता है। कोयला भंडार की कमी और मांग में संभावित उछाल के बीच कैप्टिव संयंत्रों से अधिक उत्पादन कराना तात्कालिक राहत देने वाला कदम माना जा रहा है।