करीब 100 साल बाद फिर दर्ज हुआ बांग्का स्लो लोरिस

करीब 100 साल बाद फिर दर्ज हुआ बांग्का स्लो लोरिस

इंडोनेशिया के बांग्का द्वीप पर मिलने वाले बांग्का स्लो लोरिस के जीवित होने की पुष्टि लगभग एक सदी बाद हुई है। 1930 से 1932 के बीच इस प्राइमेट का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण हुआ था। वर्ष 2026 में ‘स्पिक्सियाना’ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन ने द्वीप पर इसकी मौजूदगी की पुष्टि की।

द्वीप के कई हिस्सों में मिले प्रमाण

इंडोनेशियाई संरक्षण संस्था अलोबी वाइल्डलाइफ रेस्क्यू सेंटर ने 2015 से 2025 के बीच बांग्का के अलग-अलग स्थानों से 90 से अधिक बांग्का स्लो लोरिस का दस्तावेजीकरण किया। ये जानवर घरों, बगीचों, बागानों और सड़कों के आसपास मिले। इस तरह के रिकॉर्ड द्वीप के कई हिस्सों से आए, न कि किसी एक ज्ञात इलाके से। इससे प्रजाति का फैलाव पहले समझे गए क्षेत्र से व्यापक हो सकने का संकेत मिलता है, हालांकि इसकी वास्तविक सीमा और आबादी का आकार अभी स्थापित नहीं है।

अध्ययन के लेखकों में ऑस्ट्रिया के विएना स्थित हाउस डेस मीरेस एक्वा टेरा चिड़ियाघर में प्रकृति संरक्षण और जैव विविधता प्रबंधन के स्नातक विद्यार्थी टिमोन ग्लॉ भी शामिल थे। शोध में ऐतिहासिक वैज्ञानिक रिकॉर्ड 1930–1932 के बताए गए हैं।

बचाव के साथ आवास संरक्षण भी जरूरी

अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) ने 2020 में बांग्का स्लो लोरिस को अत्यंत संकटग्रस्त और संभवतः विलुप्त श्रेणी में रखा था। बचाव केंद्र द्वारा दर्ज 90 से अधिक जानवरों में से 86 को बचाव के बाद उपयुक्त प्राकृतिक आवासों में छोड़ा गया। कुछ लोरिस घायल अवस्था में मिले थे; इनमें बिजली के तारों से लगी चोटें भी शामिल थीं।

बांग्का द्वीप पर टिन खनन और तेल पाम के बागानों के लिए भूमि साफ किए जाने से प्राकृतिक वन आवास घट रहे हैं। ऐसे बदलाव पेड़ों पर रहने वाले इस प्राइमेट के लिए उपलब्ध स्थान को प्रभावित कर सकते हैं। केवल बचाव और पुनर्वास से इसकी स्थिति का पूरा आकलन नहीं हो सकता। इसलिए व्यवस्थित क्षेत्रीय सर्वेक्षणों की जरूरत है, जिनसे प्रजाति का वितरण, संख्या और संरक्षण की प्राथमिकताएं स्पष्ट हो सकें।

रात में सक्रिय, पेड़ों पर रहने वाला प्राइमेट

बांग्का स्लो लोरिस का वैज्ञानिक नाम Nycticebus bancanus है। यह छोटा, वृक्षवासी प्राइमेट है, जिसके लाल-भूरे बाल, बड़ी आंखें और चेहरे पर विशिष्ट निशान होते हैं। यह रात में सक्रिय रहता है और पेड़ों के बीच धीमी गति से चलता है। स्लो लोरिस स्तनधारियों में असामान्य हैं, क्योंकि इनके शरीर में विषैला स्राव बनाने की क्षमता होती है। कोहनी के पास की विशेष ग्रंथियों से निकले स्राव को ये लार के साथ मिलाकर काटते समय इस्तेमाल कर सकते हैं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • बांग्का द्वीप इंडोनेशिया का हिस्सा है और सुमात्रा के दक्षिण-पूर्वी तट के पास स्थित है।
  • बांग्का स्लो लोरिस का वैज्ञानिक नाम Nycticebus bancanus है।
  • इस प्रजाति का पिछला वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण 1930–1932 के बीच हुआ था।
  • स्लो लोरिस की कोहनी के पास स्थित ग्रंथियों का स्राव लार के साथ मिलकर काटने पर विष पहुंचाने में मदद करता है।

नई पुष्टि संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इसकी दीर्घकालिक सुरक्षा बांग्का के वन आवास बचाने और व्यवस्थित सर्वेक्षण करने पर निर्भर करेगी।

Originally written on October 22, 2026 and last modified on October 22, 2026.

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