एमआईटी का सेल्फ-फोल्डिंग ओरिगेमी रोबोट: मेडिकल टेक्नोलॉजी की दुनिया में बड़ी क्रांति
एक ऐसा छोटा रोबोट जो कैप्सूल की तरह आसानी से निगल लिया जाए, पेट के अंदर जाकर अपने आप एक जादुई खिलौने की तरह खुल जाए, शरीर के भीतर हुए घाव पर पट्टी बांध दे, गलती से निगली गई बैटरी को बाहर निकाल दे और काम खत्म होने के बाद खुद ब खुद शरीर के भीतर ही घुल जाए। यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी नहीं है, बल्कि मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी यानी एमआईटी के वैज्ञानिकों का एक ऐसा आविष्कार है जो आने वाले समय में सर्जरी और इलाज का पूरा तरीका बदलने जा रहा है। इसे ‘सेल्फ-फोल्डिंग ओरिगेमी रोबोट’ नाम दिया गया है। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में यह रोबोट एक बहुत बड़ी छलांग माना जा रहा है। पारंपरिक रूप से जब शरीर के अंदरूनी हिस्सों में कोई समस्या होती है, तो डॉक्टरों को एंडोस्कोपी या चीर-फाड़ यानी सर्जरी का सहारा लेना पड़ता है। लेकिन यह नन्हा रोबोट बिना किसी चीरे के, केवल एक कैप्सूल के जरिए शरीर के भीतर पहुंचकर मुश्किल से मुश्किल काम को अंजाम दे सकता है। मेडिकल टेक्नोलॉजी में इसे टारगेटेड ड्रग डिलीवरी और नॉन-इनवेसिव सर्जरी के भविष्य के रूप में देखा जा रहा है।
कैसे काम करता है यह जादुई ओरिगेमी रोबोट?
ओरिगेमी जापान की एक पारंपरिक कला है जिसमें कागज को बिना काटे या चिपकाए केवल मोड़कर अलग-अलग आकृतियां बनाई जाती हैं। एमआईटी के शोधकर्ताओं ने इसी तकनीक का इस्तेमाल इस रोबोट को बनाने में किया है। यह रोबोट पूरी तरह से सिकुड़कर एक छोटे से बर्फ के टुकड़े या दवा के कैप्सूल के अंदर समा जाता है। जैसे ही यह कैप्सूल मरीज के पेट में पहुंचता है और वहां के तापमान व तरल पदार्थों के संपर्क में आता है, कैप्सूल की बाहरी परत पिघल जाती है और रोबोट पेट के अंदर खुद को अनफोल्ड यानी खोल लेता है। इस रोबोट की बनावट बेहद खास है। इसमें मुख्य रूप से तीन परतें होती हैं। बीच की परत एक ऐसे मटेरियल की होती है जो गर्मी पाकर सिकुड़ती है, जबकि बाहरी परतें बायोकम्पैटिबल यानी शरीर को नुकसान न पहुंचाने वाले पदार्थों से बनी होती हैं। इस रोबोट के बीच में एक छोटा सा नियोडिमियम मैग्नेट यानी चुंबकीय टुकड़ा लगा होता है। शरीर के बाहर बैठे डॉक्टर एक बाहरी चुंबकीय नियंत्रण प्रणाली की मदद से इस रोबोट की गतिविधियों को नियंत्रित करते हैं। चुंबकीय क्षेत्र में बदलाव करके रोबोट को पेट की दीवारों पर आगे-पीछे चलाया जा सकता है, मोड़ा जा सकता है और सटीक जगह पर पहुंचाया जा सकता है।

पेट में फंसी खतरनाक बैटरियों से बचाएगा यह रोबोट
हर साल दुनिया भर में हजारों बच्चे और बुजुर्ग गलती से छोटी बटन बैटरियों को निगल लेते हैं। यह एक बेहद गंभीर स्थिति होती है क्योंकि पेट के एसिड के संपर्क में आते ही ये बैटरियां रासायनिक प्रतिक्रिया करने लगती हैं और कुछ ही घंटों में पेट की नाजुक परत को जला सकती हैं। ऐसे मामलों में तुरंत सर्जरी करनी पड़ती है। एमआईटी के इस ओरिगेमी रोबोट को विशेष रूप से इस समस्या से निपटने के लिए टेस्ट किया गया है। जब इस रोबोट को पेट में भेजा जाता है, तो डॉक्टर इसे मैग्नेट की मदद से सीधे उस बटन बैटरी तक ले जाते हैं। रोबोट अपने चुंबकीय खिंचाव से उस बैटरी को अपने साथ चिपका लेता है। इसके बाद, डॉक्टर रोबोट को नियंत्रित करते हुए सुरक्षित रूप से पाचन तंत्र के जरिए शरीर से बाहर निकाल देते हैं। यह पूरी प्रक्रिया इतनी सुरक्षित है कि इसमें मरीज को किसी भी तरह के दर्द या घाव का सामना नहीं करना पड़ता।
शरीर के अंदर ही घुल जाने की अनोखी खूबी
इस रोबोट की सबसे बड़ी विशेषता इसका पूरी तरह से बायोडिग्रेडेबल होना है। मेडिकल टेक्नोलॉजी में अक्सर यह चुनौती होती है कि इलाज के बाद शरीर के अंदर छोड़े गए उपकरणों को कैसे निकाला जाए। एमआईटी के वैज्ञानिकों ने इस चुनौती का हल बहुत ही समझदारी से निकाला है। यह रोबोट सूखे सूअर की आंत से बने मटेरियल (कैटगट) और एक विशेष प्रकार के सिकुड़ने वाले प्लास्टिक से बना है। जब यह रोबोट अपना काम पूरा कर लेता है, तो इसे शरीर से बाहर निकालने के लिए किसी दोबारा प्रक्रिया की जरूरत नहीं होती। पाचन तंत्र में मौजूद एसिड और एंजाइम्स समय के साथ इस रोबोट को पूरी तरह से विघटित कर देते हैं, जिससे यह शरीर के भीतर ही घुल जाता है। इसका मतलब यह है कि इलाज के बाद शरीर में कोई बाहरी कचरा या धातु का टुकड़ा बाकी नहीं रहता।
मेडिकल रोबोटिक्स का भविष्य और आगे की राह
एमआईटी का यह ओरिगेमी रोबोट सिर्फ शुरुआत है। आने वाले समय में इस तकनीक का दायरा बहुत बड़ा होने वाला है। वैज्ञानिक अब इस रोबोट में छोटे-छोटे सेंसर्स लगाने पर काम कर रहे हैं, जिससे यह पेट के अंदरूनी हिस्से की वास्तविक स्थिति, तापमान और एसिडिटी के स्तर की लाइव जानकारी डॉक्टरों को दे सकेगा। इसके अलावा, इसका उपयोग शरीर के किसी खास हिस्से में सीधे दवा पहुंचाने (टार्गेटेड ड्रग डिलीवरी) के लिए भी किया जाएगा, जिससे कैंसर जैसी बीमारियों के इलाज में कीमोथेरेपी के साइड इफेक्ट्स को काफी हद तक कम किया जा सकेगा। रोबोटिक्स और मेडिकल साइंस का यह अनूठा मेल आने वाले दिनों में अस्पतालों के आईसीयू और ऑपरेशन थिएटर की तस्वीर बदलने की ताकत रखता है। भविष्य में ऐसी तकनीकें आम लोगों के लिए इलाज को न सिर्फ आसान बनाएंगी, बल्कि चिकित्सा के खर्च और रिकवरी के समय को भी बहुत कम कर देंगी।