एआई विज्ञापनों पर एएससीआई की नई लेबलिंग गाइडलाइन

एआई विज्ञापनों पर एएससीआई की नई लेबलिंग गाइडलाइन

भारत में विज्ञापन अब तेजी से कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से बनाए और बदले जा रहे हैं। ऐसे में उपभोक्ता को यह स्पष्ट पता चले कि कोई दृश्य, आवाज़ या प्रस्तुति असली है या एआई से तैयार की गई है, इसके लिए विज्ञापन मानक परिषद भारत (एएससीआई) ने सिंथेटिक रूप से जनित सामग्री के लेबलिंग से जुड़ी नई गाइडलाइन जारी की है।

क्या है नई गाइडलाइन

एएससीआई ने 29 सितंबर 2026 को “विज्ञापन में सिंथेटिक रूप से जनित सामग्री की जिम्मेदार लेबलिंग के लिए दिशानिर्देश” जारी किए। यह ढांचा उन विज्ञापनों पर लागू होगा जिनमें एआई या समान डिजिटल टूल्स से बनाई या बदली गई सामग्री का उपयोग किया गया है। इसमें सिंथेटिक इन्फ्लुएंसर, किसी व्यक्ति की आवाज़ या रूप की नकल, काल्पनिक घटनाएं और बनाए गए लोकेशन जैसे तत्व शामिल हैं।

एएससीआई भारत में विज्ञापन के लिए एक स्व-नियामक संस्था है, जो प्रिंट, डिजिटल, टेलीविजन और अन्य माध्यमों के लिए आचार मानक तय करती है।

लेबल कब जरूरी होगा

नए नियमों के अनुसार, जब एआई-जनित सामग्री उपभोक्ता के निर्णय को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती हो और उसके बारे में जानकारी छिपाने से भ्रम पैदा हो सकता हो, तब स्पष्ट लेबल लगाना अनिवार्य होगा। विज्ञापनदाता “Audio/Video created using AI” या “Audio/Video enhanced using AI” जैसे लेबल का उपयोग कर सकते हैं, ताकि दर्शक को सामग्री की प्रकृति समझ में आ सके।

यह व्यवस्था खास तौर पर पारदर्शिता बढ़ाने और भ्रामक विज्ञापन पर रोक लगाने के लिए बनाई गई है। एआई का उपयोग केवल सामग्री को आकर्षक बनाने के लिए नहीं, बल्कि उपभोक्ता को गुमराह करने के लिए भी किया जा सकता है; इसलिए लेबलिंग को जरूरी माना गया है।

किन उपयोगों पर रोक रहेगी

गाइडलाइन में कुछ मामलों को लेबल लगाने के बावजूद भी प्रतिबंधित रखा गया है। इनमें झूठे समर्थन या एंडोर्समेंट, उत्पाद के गलत परिणाम दिखाना, ऐसी जगहों को वास्तविक बताना जो मौजूद ही नहीं हैं, बिना अनुमति कॉपीराइट सामग्री का उपयोग, डीपफेक और किसी व्यक्ति की छवि या आवाज़ का बिना सहमति इस्तेमाल शामिल है।

इसका अर्थ यह है कि केवल “एआई-जनित” लिख देने से हर तरह की सामग्री वैध नहीं हो जाएगी। यदि सामग्री उपभोक्ता को भ्रमित करती है या किसी व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन करती है, तो वह फिर भी आपत्तिजनक मानी जाएगी।

कौन-सी चीजें लेबल से बाहर रहेंगी

एएससीआई ने कुछ सामान्य संपादकीय बदलावों को लेबलिंग से छूट दी है, बशर्ते वे उपभोक्ता के निर्णय को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित न करें। इनमें रंग सुधार, रोशनी में बदलाव, मामूली दाग-धब्बे हटाना, सजावटी तत्व जोड़ना, स्पष्ट रूप से काल्पनिक प्रभाव, एआई-सहायता से विज्ञापन कॉपी लिखना और सबटाइटल जैसी पहुंच-संबंधी सुविधाएं शामिल हैं।

इन छूटों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हर छोटे तकनीकी बदलाव पर अनावश्यक लेबल न लगाना पड़े, लेकिन जहां सामग्री का असर खरीद निर्णय पर पड़ता है, वहां पारदर्शिता बनी रहे। ये नियम प्रकाशन के तीन महीने बाद लागू होंगे।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • एएससीआई की स्थापना 1985 में भारत में विज्ञापन के स्व-नियमन के लिए की गई थी।
  • डीपफेक ऐसी सिंथेटिक मीडिया तकनीक है जिसमें किसी व्यक्ति का चेहरा, आवाज़ या हरकतें डिजिटल रूप से बदली या बनाई जाती हैं।
  • विज्ञापन में एआई का उपयोग कंटेंट निर्माण, इमेज एडिटिंग, वॉइस सिंथेसिस और ऑडियंस टार्गेटिंग में होता है।
  • उपभोक्ता संरक्षण के नियमों में अक्सर ऐसी जानकारी के खुलासे की जरूरत होती है जो खरीद निर्णय को प्रभावित कर सकती है।

कुल मिलाकर, यह कदम एआई-आधारित विज्ञापनों में पारदर्शिता, उपभोक्ता विश्वास और जिम्मेदार डिजिटल मार्केटिंग की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

Originally written on September 29, 2026 and last modified on September 29, 2026.

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