उत्तर पश्चिमी घाट में नई खोज से उभरा केसीलियन जैवविविधता का महत्व
महाराष्ट्र के उत्तरी पश्चिमी घाट में भूमिगत जीवन जीने वाली एक नई उभयचर प्रजाति Gegeneophis chandgadi की खोज ने इस क्षेत्र को केसीलियन विविधता के लिहाज से और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। कोल्हापुर क्षेत्र में मिली यह प्रजाति उन दुर्लभ जीवों में शामिल है जो सतह पर कम दिखते हैं, लेकिन मिट्टी के भीतर पारिस्थितिकी तंत्र का अहम हिस्सा होते हैं।
केसीलियन क्या होते हैं और क्यों खास हैं
केसीलियन Gymnophiona गण के उभयचर हैं। इनके पैर नहीं होते और शरीर लंबा, बेलनाकार होता है, इसलिए इन्हें अक्सर केंचुआ या साँप समझ लिया जाता है। ये जीव जमीन के भीतर सुरंग बनाकर रहते हैं और इसी कारण इनका अध्ययन कठिन माना जाता है। भारत में उभयचरों की कुल 458 प्रजातियाँ दर्ज हैं, जिनमें 42 केसीलियन प्रजातियाँ शामिल हैं।
कोल्हापुर की खोज ने बढ़ाई वैज्ञानिक दिलचस्पी
Gegeneophis chandgadi को महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के चंदगढ़ क्षेत्र के बुजवाड़े गाँव में पाया गया। इस प्रजाति की पहचान भारतीय प्राणी सर्वेक्षण, पश्चिमी क्षेत्रीय केंद्र, पुणे; यशवंतराव चव्हाण महाविद्यालय; सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय; और म्हादेई रिसर्च सेंटर, गोवा के वैज्ञानिकों की संयुक्त टीम ने की। प्रजाति का नाम क्षेत्र में बोली जाने वाली चंदगडी मराठी बोली से जुड़ा है।
पश्चिमी घाट में एंडेमिज़्म का मजबूत केंद्र
पश्चिमी घाट को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा प्राप्त है और इसे दुनिया के आठ सबसे बड़े जैवविविधता हॉटस्पॉट में गिना जाता है। भारत में Gegeneophis वंश की 12 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से 11 पश्चिमी घाट की स्थानिक हैं। इसी तरह पश्चिमी घाट में 26 स्थानिक केसीलियन प्रजातियाँ दर्ज हैं, जो इस पर्वतीय क्षेत्र की अनोखी जैविक समृद्धि को दर्शाती हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- Gegeneophis chandgadi एक पैरविहीन उभयचर प्रजाति है, जिसे महाराष्ट्र के उत्तरी पश्चिमी घाट में खोजा गया।
- केसीलियन Gymnophiona गण के अंतर्गत आते हैं और भूमिगत जीवन के लिए अनुकूलित होते हैं।
- भारत में 458 उभयचर प्रजातियों में 42 केसीलियन प्रजातियाँ दर्ज हैं।
- Gegeneophis valmiki की खोज जनवरी 2026 में महाराष्ट्र के सतारा जिले के वाल्मीकि पठार पर हुई थी।
संरक्षण के लिहाज से क्यों अहम है यह खोज
केसीलियन अक्सर सतह पर कम दिखाई देते हैं, इसलिए उनकी आबादी, वितरण और आवासीय जरूरतों को समझना चुनौतीपूर्ण होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, खंडित आवासों में कई ऐसी प्रजातियाँ भी हो सकती हैं जो बिना दर्ज हुए ही विलुप्ति की ओर बढ़ जाएँ। इसी कारण इन खोजों को जैवविविधता दस्तावेज़ीकरण और संरक्षण नीति दोनों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पश्चिमी घाट में मिली यह नई प्रजाति केवल एक वैज्ञानिक खोज नहीं, बल्कि इस बात का संकेत भी है कि भारत के पर्वतीय और भूमिगत आवास अभी भी कई अनदेखे जीवों को समेटे हुए हैं।