आईएएफ की 17वीं स्क्वाड्रन ‘गोल्डन एरो’ की 75 साल की विरासत
भारतीय वायुसेना की 17वीं स्क्वाड्रन ‘गोल्डन एरो’ ने 1 अक्टूबर 2026 को अपनी स्थापना के 75 वर्ष पूरे कर लिए। यह स्क्वाड्रन भारतीय वायुसेना की उन चुनिंदा इकाइयों में शामिल है, जिनकी पहचान लंबे समय से युद्धक क्षमता, तकनीकी बदलाव और महत्वपूर्ण सैन्य अभियानों में भागीदारी से बनी है। अंबाला एयर फोर्स स्टेशन से शुरू हुई यह इकाई आज वायुसेना के आधुनिक इतिहास का एक अहम अध्याय मानी जाती है।
अंबाला से शुरू हुई एक ऐतिहासिक स्क्वाड्रन
17वीं स्क्वाड्रन का गठन 1 अक्टूबर 1951 को एयर फोर्स स्टेशन अंबाला में हुआ था। इसके पहले कमांडिंग ऑफिसर फ्लाइट लेफ्टिनेंट डी. एल. स्प्रिंगेट थे। शुरुआत में यह एक टैक्टिकल रिकॉनिसेंस यूनिट के रूप में काम करती थी। उस दौर में वायुसेना के लिए यह इकाई न केवल निगरानी और जानकारी जुटाने के लिहाज से महत्वपूर्ण थी, बल्कि यह भारतीय सैन्य उड्डयन के शुरुआती विस्तार का भी प्रतीक बनी।
शुरुआत में स्क्वाड्रन ने 12 अमेरिकी हार्वर्ड-II B विमानों का संचालन किया। बाद में 1955 में इसे ब्रिटिश डी हैविलैंड वैम्पायर विमानों पर स्थानांतरित किया गया। वैम्पायर भारतीय वायुसेना के शुरुआती जेट विमानों में शामिल था, इसलिए इस बदलाव ने स्क्वाड्रन को जेट युग में प्रवेश कराने में अहम भूमिका निभाई।
युद्धों और अभियानों में लगातार मौजूदगी
समय के साथ 17वीं स्क्वाड्रन ने भारतीय सैन्य अभियानों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। 1961 के गोवा मुक्ति अभियान से लेकर 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों तक, इस स्क्वाड्रन ने वायुसेना की परिचालन क्षमता को सशक्त किया। बाद में 1999 के कारगिल संघर्ष में भी इसकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।
कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना के हवाई अभियान को ऑपरेशन सफेद सागर के नाम से जाना जाता है। इसके बाद बालाकोट हमलों और मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर जैसे हालिया अभियानों में भी इस स्क्वाड्रन का नाम सामने आया। इससे स्पष्ट होता है कि यह इकाई केवल ऐतिहासिक महत्व की नहीं, बल्कि आधुनिक सैन्य जरूरतों के अनुरूप भी लगातार सक्रिय रही है।
राफेल युग और नई पहचान
2016 में मिग-21 विमानों के चरणबद्ध हटने के दौरान इस स्क्वाड्रन को नंबर-प्लेट कर दिया गया था। लेकिन 11 सितंबर 2019 को इसे फिर से अंबाला में खड़ा किया गया। इसी के साथ यह भारतीय वायुसेना की पहली ऐसी इकाई बनी, जिसने डसॉल्ट राफेल लड़ाकू विमान का संचालन शुरू किया।
राफेल के साथ 17वीं स्क्वाड्रन ने भारतीय वायुसेना की आधुनिक लड़ाकू क्षमता के नए चरण का प्रतिनिधित्व किया। अंबाला से इसकी पुनर्स्थापना ने न केवल रणनीतिक दृष्टि से महत्व बढ़ाया, बल्कि इसे अत्याधुनिक वायु युद्धक प्रणाली का प्रमुख हिस्सा भी बना दिया।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- 17वीं स्क्वाड्रन ‘गोल्डन एरो’ की स्थापना 1 अक्टूबर 1951 को एयर फोर्स स्टेशन अंबाला में हुई थी।
- इसके पहले कमांडिंग ऑफिसर फ्लाइट लेफ्टिनेंट डी. एल. स्प्रिंगेट थे।
- यह भारतीय वायुसेना की पहली इकाई बनी, जिसने डसॉल्ट राफेल विमान का संचालन किया।
- कारगिल संघर्ष 1999 के दौरान भारतीय वायुसेना के हवाई अभियान को ऑपरेशन सफेद सागर कहा गया था।
75 वर्षों की यह यात्रा भारतीय वायुसेना की निरंतर बदलती तकनीक, युद्धक तैयारी और रणनीतिक अनुकूलन की कहानी भी है। ‘गोल्डन एरो’ आज भी वायुसेना की उन इकाइयों में गिनी जाती है, जिनकी विरासत और भूमिका दोनों ही अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।