अटोक से कटक तक: मराठा साम्राज्य के अभूतपूर्व विस्तार की वो छिपी रणनीतियां
18वीं सदी के मध्य में जब मुगल सल्तनत की दीवारें दरक रही थीं, तब भारत के नक्शे पर एक नई ताकत का उभार हुआ जिसने उत्तर में अटोक (आधुनिक पाकिस्तान) से लेकर पूर्व में कटक (ओडिशा) और दक्षिण में तंजावुर तक अपना भगवा परचम लहराया। मराठा साम्राज्य, जिसकी शुरुआत छत्रपति शिवाजी महाराज ने पश्चिमी घाट की पहाड़ियों के छोटे से इलाके से की थी, वह देखते ही देखते लगभग 25 लाख वर्ग किलोमीटर के विशाल भूभाग पर फैल गया। यह कोई साधारण सैन्य जीत नहीं थी। मुगलों की विशाल सेना, आधुनिक तोपखाने और असीमित संसाधनों के सामने एक क्षेत्रीय शक्ति का पूरे उपमहाद्वीप पर हावी हो जाना इतिहास की सबसे रोमांचक कहानियों में से एक है। मराठा साम्राज्य ने इतनी दूर तक अपना असर कैसे फैलाया, इसके पीछे सिर्फ तलवारों की धार नहीं बल्कि बेजोड़ युद्ध कौशल, अनूठी प्रशासनिक नीतियां और मनोवैज्ञानिक युद्ध रणनीतियां शामिल थीं।
गनिमी कावा: गुरिल्ला युद्ध की वो तकनीक जिसने मुगलों को थकाया
मराठा सेना की सबसे बड़ी ताकत उनकी गति और अप्रत्याशितता थी, जिसे ‘गनिमी कावा’ यानी गुरिल्ला युद्ध पद्धति कहा जाता था। मुगलों की सेना भारी-भरकम साजो-सामान, हाथियों और बड़े तोपखानों के साथ चलती थी, जिससे उनकी रफ्तार बहुत धीमी हो जाती थी। इसके विपरीत, मराठा सैनिक हल्के हथियारों से लैस छोटे घोड़ों पर सवार होते थे। मराठा कभी भी मुगलों से सीधे मैदान में आमने-सामने की लड़ाई नहीं लड़ते थे, जहां दुश्मन की संख्यात्मक ताकत भारी पड़ सकती थी। इसके बजाय, वे अचानक पहाड़ियों या जंगलों से निकलकर दुश्मन की रसद (सप्लाई लाइन) पर हमला करते थे, उन्हें लूटते थे और इससे पहले कि दुश्मन संभल पाए, वे हवा की तरह गायब हो जाते थे। 26 सालों तक दक्कन में खुद डेरा डालकर बैठे मुगल बादशाह औरंगजेब की विशाल सेना को मराठों ने इसी थकाऊ रणनीति से पस्त कर दिया था। जब तक औरंगजेब की मृत्यु हुई, मुगल सेना अंदर से पूरी तरह खोखली हो चुकी थी।

किलों का जाल: रक्षा की अभेद्य दीवार
छत्रपति शिवाजी महाराज ने बहुत जल्दी समझ लिया था कि दक्कन की ऊबड़-खाबड़ और पहाड़ी भूगोल ही उनकी सबसे बड़ी ढाल है। उन्होंने अपने जीवनकाल में 300 से अधिक किलों का एक ऐसा जाल तैयार किया, जो एक-दूसरे से रणनीतिक रूप से जुड़े हुए थे। रायगढ़, प्रतापगढ़, और सिंधुदुर्ग जैसे किलों ने मराठा सेना को एक सुरक्षित बेस प्रदान किया। अगर मुगलों की कोई बड़ी सेना किसी एक किले को घेर भी लेती, तो मराठा सैनिक आसानी से उसे छोड़कर दूसरे किले में शिफ्ट हो जाते थे और दुश्मन को भूखा मरने के लिए छोड़ देते थे। इन किलों की वजह से ही औरंगजेब दशकों की कोशिश के बाद भी मराठा शक्ति को पूरी तरह दबा नहीं सका।

चौथ और सरदेशमुखी: साम्राज्य विस्तार का आर्थिक इंजन
किसी भी बड़े साम्राज्य को चलाने और लगातार युद्ध लड़ने के लिए भारी धन की आवश्यकता होती है। मराठों ने इसके लिए एक अनोखा वित्तीय मॉडल तैयार किया, जिसे ‘चौथ’ और ‘सरदेशमुखी’ कहा जाता था। यह व्यवस्था साम्राज्य विस्तार की सबसे बड़ी रीढ़ बनी।
| टैक्स का नाम | हिस्सा (प्रतिशत) | यह क्या था और क्यों लिया जाता था? |
| चौथ | 25% | यह पड़ोसी या पराजित राज्यों के कुल राजस्व का एक-चौथाई हिस्सा होता था। इसके बदले में मराठा उस राज्य को बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा और खुद मराठा छापों से बचने की गारंटी देते थे। |
| सरदेशमुखी | 10% | यह एक अतिरिक्त कर था, जिसे छत्रपति इस आधार पर वसूलते थे कि वे दक्कन के वंशानुगत ‘सरदेशमुख’ यानी मुख्य अधिपति हैं। |
इस टैक्स प्रणाली का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि मराठों को उन इलाकों पर सीधा प्रशासनिक नियंत्रण किए बिना भी वहां से भारी राजस्व मिलने लगा। इस पैसे का इस्तेमाल एक बेहद आधुनिक, अनुशासित और बड़ी सेना को बनाए रखने के लिए किया गया, जिसने आगे चलकर उत्तर भारत की तरफ रुख किया।
पेशवाओं का उदय और उत्तर की ओर छलांग
1707 में औरंगजेब की मौत के बाद जब छत्रपति शाहू जी महाराज के काल में ‘पेशवा’ (प्रधानमंत्री) व्यवस्था मजबूत हुई, तब मराठा साम्राज्य का चरित्र पूरी तरह बदल गया। पहले जो रणनीति केवल अपनी रक्षा करने तक सीमित थी, पेशवा बाजीराव प्रथम के आते ही वह आक्रामक विस्तार में बदल गई। पेशवा बाजीराव प्रथम ने मुगलों की कमजोरी को भांपते हुए एक प्रसिद्ध नारा दिया था कि “हमें इस बूढ़े वृक्ष के तने पर प्रहार करना चाहिए, शाखाएं तो अपने आप गिर जाएंगी।” उन्होंने मराठा सेना को दक्कन से निकालकर मालवा, गुजरात और बुंदेलखंड तक पहुंचा दिया। बाजीराव प्रथम को इतिहास के सबसे महान सैन्य रणनीतिकारों में गिना जाता है, जिन्होंने अपने जीवन में लड़ा एक भी युद्ध नहीं हारा। उनकी बिजली जैसी तेज घुड़सवार सेना ने दिल्ली के दरवाजे खटखटा दिए और राजपूत राजाओं से लेकर मुगलों तक सबको समझौते के लिए मजबूर कर दिया।
मराठा परिसंघ: सत्ता का विकेंद्रीकरण
साम्राज्य जैसे-जैसे बड़ा हुआ, पुणे में बैठे पेशवा के लिए अकेले इतने बड़े भारत पर शासन करना असंभव होता जा रहा था। इसलिए मराठों ने ‘मराठा परिसंघ’ (Maratha Confederacy) का गठन किया। इसके तहत पांच बड़े और शक्तिशाली मराठा घरानों ने अलग-अलग क्षेत्रों की जिम्मेदारी संभाली:
- पेशवा: पुणे से पूरे परिसंघ का नेतृत्व करते थे।
- सिंधिया (शिंदे): ग्वालियर और उज्जैन के क्षेत्रों से उत्तर भारत पर नियंत्रण रखते थे।
- होल्कर: इंदौर और मालवा के क्षेत्र को संभालते थे।
- गायकवाड़: बड़ौदा और गुजरात के संपन्न व्यापारिक मार्गों की रक्षा करते थे।
- भोंसले: नागपुर से लेकर ओडिशा और बंगाल की सीमाओं तक प्रभाव रखते थे।
इस विकेंद्रीकरण का फायदा यह हुआ कि हर घराने के पास अपनी स्वतंत्र सेना और प्रशासनिक क्षमता थी। जब मुगलों ने ओडिशा छोड़ा, तो भोंसले ने वहां कटक तक नियंत्रण कर लिया। वहीं महादजी सिंधिया जैसे महान सेनापति ने उत्तर में दिल्ली के मुगल बादशाह को अपने संरक्षण में ले लिया, जिससे मराठा साम्राज्य का असर व्यावहारिक रूप से पूरे देश पर स्थापित हो गया।
नौसेना का निर्माण: समंदर पर भी धाक
ज्यादातर भारतीय साम्राज्य समंदर की ताकत को नजरअंदाज करते थे, लेकिन मराठा इस मामले में बहुत आगे थे। छत्रपति शिवाजी महाराज ने कोंकण तट की रक्षा और विदेशी व्यापारियों (पुर्तगाली, डच और अंग्रेज) पर लगाम लगाने के लिए एक मजबूत नौसेना (मराठा नेवी) की नींव रखी। कांग्होजी आंग्रे जैसे कुशल नौसेना प्रमुख के नेतृत्व में मराठा नौसेना इतनी शक्तिशाली हो गई थी कि ब्रिटिश और पुर्तगाली जहाजों को भी कोंकण तट से गुजरने के लिए टैक्स देना पड़ता था। पश्चिमी तट पर इस मजबूत पकड़ ने मराठों को पीछे से पूरी तरह सुरक्षित रखा, जिससे वे बेफिक्र होकर मुख्य भूमि भारत में आगे बढ़ सके।
अटोक की विजय और पानीपत का मोड़
1758 में रघुनाथ राव के नेतृत्व में मराठा सेना ने पंजाब को पार करते हुए आज के पाकिस्तान में स्थित अटोक के किले पर अपना झंडा फहरा दिया। यह मराठा साम्राज्य के विस्तार का चरम बिंदु था। इस अभूतपूर्व विस्तार ने अफगानिस्तान के शासक अहमद शाह अब्दाली को चुनौती दी, जिसके परिणामस्वरूप 1761 में पानीपत का तीसरा युद्ध हुआ। हालांकि पानीपत के इस युद्ध में मराठों को भारी नुकसान उठाना पड़ा और उनके हजारों सर्वश्रेष्ठ सैनिक और सेनापति मारे गए, लेकिन इस हार के बाद भी उनका असर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। अगले ही दशक में पेशवा माधवराव प्रथम और महादजी सिंधिया के नेतृत्व में ‘मराठा पुनरुत्थान’ हुआ, जिसने दोबारा उत्तर भारत पर अपनी धाक जमाई और अंततः 1818 में अंग्रेजों के साथ अंतिम टकराव तक वे भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बने रहे।