6G की रेस में भारत का बड़ा दांव: जानिए क्या है DoT और TSDSI का नया मास्टरप्लान
जब भी कोई नई मोबाइल टेक्नोलॉजी आती है—चाहे वह 4G हो, 5G हो या आने वाला 6G—तो उसकी रफ्तार, फ्रिक्वेंसी और नेटवर्क के नियम कौन तय करता है? दुनिया में इसके लिए कुछ चुनिंदा वैश्विक संस्थाएं हैं जो टेलीकॉम के नियम यानी ‘स्टैंडर्ड्स’ बनाती हैं। सालों से इन संस्थाओं पर पश्चिमी देशों और कुछ बड़े एशियाई देशों का दबदबा रहा है। लेकिन अब भारत इस खेल के नियमों को बदलने की तैयारी में है। हाल ही में भारत सरकार के दूरसंचार विभाग (DoT) ने टेलीकॉम स्टैंडर्ड्स डेवलपमेंट सोसाइटी, इंडिया (TSDSI) के साथ एक बेहद महत्वपूर्ण समझौता (MoU) किया है। दिखने में यह एक सामान्य सरकारी एग्रीमेंट लग सकता है, लेकिन गहराई से देखें तो यह भारत को वैश्विक टेलीकॉम मार्केट का ‘लीडर’ बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इस रणनीतिक साझेदारी का सीधा मकसद भारत को सिर्फ तकनीक का इस्तेमाल करने वाला देश नहीं, बल्कि तकनीक के नियम तय करने वाला ग्लोबल पावरहाउस बनाना है।
क्या है यह समझौता और क्यों है इतना खास?
इस समझौते को दूरसंचार मंत्रालय की ‘टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट एंड इन्वेस्टमेंट प्रमोशन’ (TDIP) योजना के तहत अमलीजामा पहनाया गया है। सरकार ने इस पूरी योजना के लिए साल 2026 से 2031 तक के लिए 203 crore रुपये का बजट अलॉट किया है। यह फंड सीधे तौर पर भारत में स्वदेशी टेलीकॉम टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देने, रिसर्च करने और वैश्विक स्तर पर भारत की भागीदारी बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। इस एमओयू के जरिए दूरसंचार विभाग भारत के स्टार्टअप्स, एमएसएमई (MSMEs) और कॉलेज-यूनिवर्सिटीज को सीधे ग्लोबल प्लेटफॉर्म्स से जोड़ने जा रहा है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जब दुनिया भर के वैज्ञानिक और कंपनियां बैठकर भविष्य की तकनीकों के नियम तय कर रहे होंगे, तब वहां भारतीय दिमाग भी मौजूद होंगे और भारत की जरूरतों के हिसाब से नियम बनवा सकेंगे।

टीएसडीएसआई (TSDSI) की भूमिका और ग्लोबल नेटवर्क
आम लोगों के लिए TSDSI एक नया नाम हो सकता है, लेकिन टेलीकॉम की दुनिया में इसकी भूमिका बहुत बड़ी है। यह भारत की एक स्वायत्त और मेंबर-बेस्ड संस्था है जो भारत के लिए टेलीकॉम और डिजिटल कम्युनिकेशन से जुड़े टेक्निकल स्टैंडर्ड्स विकसित करती है। सबसे खास बात यह है कि TSDSI वैश्विक स्तर की दिग्गज संस्थाओं जैसे 3GPP और oneM2M का एक अहम हिस्सा है। 3GPP वही वैश्विक संस्था है जो पूरी दुनिया के लिए 5G और 6G नेटवर्क के मापदंड तय करती है। TSDSI के जरिए ही भारत ने पहले भी 5G के दौरान ग्रामीण इलाकों में बेहतर कवरेज के लिए ‘5Gi’ नाम का एक खास स्टैंडर्ड वैश्विक मंच पर पेश किया था। अब इस नए समझौते के बाद TSDSI के पास और ज्यादा संसाधन होंगे, जिससे वह वैश्विक बैठकों में भारत का पक्ष और मजबूती से रख पाएगी।

भारत का असली निशाना: भारत 6G मिशन
इस पूरे समझौते के केंद्र में एक ही सबसे बड़ा लक्ष्य है—’भारत 6G मिशन’। जब 5G तकनीक आई, तब भारत ने उसे अपनाने में थोड़ी देर की थी, लेकिन 5G रोलआउट के मामले में भारत ने दुनिया में सबसे तेज रफ्तार दिखाई। अब सरकार 6G के मामले में कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती। भारत का लक्ष्य है कि जब साल 2030 तक दुनिया में 6G कमर्शियल तौर पर लॉन्च हो, तब उसमें इस्तेमाल होने वाले पेटेंट्स और टेक्नोलॉजी का एक बड़ा हिस्सा ‘मेड इन इंडिया’ हो। 6G सिर्फ तेज इंटरनेट स्पीड के बारे में नहीं है। यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सैटेलाइट कम्युनिकेशन, स्मार्ट सिटीज और पूरी तरह से कनेक्टेड गाड़ियों (Connected Mobility) का दौर होगा। अगर भारत शुरुआत से ही इसके नियमों को तय करने में शामिल रहेगा, तो भारतीय कंपनियों को विदेशी पेटेंट्स पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और अरबों रुपये की रॉयल्टी बचेगी।
भारतीय स्टार्टअप्स और एमएसएमई को कैसे मिलेगा पंख?
अक्सर भारत के छोटे स्टार्टअप्स या कॉलेज के स्टूडेंट्स बेहतरीन टेलीकॉम टेक्नोलॉजी तो बना लेते हैं, लेकिन उनके पास इतनी फंडिंग या पहुंच नहीं होती कि वे स्विट्जरलैंड, अमेरिका या यूरोप में होने वाली अंतरराष्ट्रीय बैठकों में जाकर अपनी तकनीक को ग्लोबल स्टैंडर्ड का हिस्सा बनवा सकें। वैश्विक संस्थाओं की मेंबरशिप और वहां जाने का खर्च बहुत ज्यादा होता है। इस समझौते के बाद सरकार TDIP स्कीम के जरिए इन होनहारों को वित्तीय मदद देगी।
- ग्लोबल मीटिंग्स की मेजबानी: भारत अब 3GPP और oneM2M जैसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय टेलीकॉम बैठकों की मेजबानी अपने देश में करेगा। इससे भारतीय डेवलपर्स को अपने ही देश में ग्लोबल एक्सपर्ट्स के साथ सीधे जुड़ने का मौका मिलेगा।
- फाइनेंशियल सपोर्ट: अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं (जैसे ITU और oneM2M) में TSDSI की मेंबरशिप को जारी रखने और उसे बढ़ाने के लिए सरकार सीधे आर्थिक मदद देगी।
- इंडीजीनस पेटेंट्स को बढ़ावा: भारतीय रिसर्चर्स द्वारा बनाए गए पेटेंट्स को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाने के लिए पूरी कागजी और कानूनी प्रक्रिया में मदद की जाएगी।
कैसे काम करेगी यह पूरी व्यवस्था?
इस नई पहल को समझने के लिए इसके मुख्य पिलर्स और उनके काम करने के तरीके को देखना जरूरी है। नीचे दी गई टेबल से समझिए कि इस पूरे ईकोसिस्टम में कौन क्या भूमिका निभा रहा है:
| संस्था/योजना | मुख्य भूमिका और जिम्मेदारी |
| दूरसंचार विभाग (DoT) | पूरी योजना को गाइड करना, नीति बनाना और वित्तीय सहायता (फंडिंग) जारी करना। |
| TSDSI | भारतीय तकनीकों को कंपाइल करना और अंतरराष्ट्रीय मंचों (3GPP, ITU) पर भारत का प्रतिनिधित्व करना। |
| TDIP स्कीम | 203 करोड़ रुपये के बजट के साथ स्टार्टअप्स, MSMEs और एकेडेमिया को ग्लोबल स्टैंडर्ड्स में भाग लेने के लिए स्पॉन्सर करना। |
| स्टार्टअप्स और रिसर्चर्स | 6G, एआई और नेटवर्क सिक्योरिटी के क्षेत्र में नई स्वदेशी तकनीकों और पेटेंट्स का आविष्कार करना। |
इतिहास से सीखकर भविष्य बदलने की तैयारी
मानव सभ्यता का इतिहास गवाह है कि जिसने भी दुनिया के नेटवर्क्स और कम्युनिकेशंस पर कंट्रोल किया है, उसी ने दुनिया की तरक्की की दिशा तय की है। कभी यह काम समुद्री रास्तों ने किया, तो कभी रेलवे लाइनों ने। आज के डिजिटल युग में टेलीकॉम नेटवर्क ही वह अदृश्य ताकत है जो पूरी दुनिया को चला रही है। अब तक भारत दूसरों की बनाई तकनीकों और उपकरणों को खरीदकर अपने देश में नेटवर्क चलाता था। लेकिन अब भारत सिर्फ एक मार्केट या प्रयोगशाला बनकर नहीं रहना चाहता जहां विदेशी कंपनियां आकर अपने प्रोडक्ट्स का टेस्ट करें। भारत खुद एक ऐसा हब बनना चाहता है जहां से पूरी दुनिया के लिए डिजिटल पब्लिक गुड्स और नेक्स्ट-जेनरेशन टेलीकॉम टेक्नोलॉजी की शुरुआत हो। DoT और TSDSI का यह नया गठजोड़ इसी आत्मनिर्भर और ग्लोबल लीडर बनने वाले भारत की नींव रख रहा है।