लद्दाख की पोगा घाटी में भारत के पहले और सबसे गहरे भू-तापीय कुओं का शुभारंभ

लद्दाख की पोगा घाटी में भारत के पहले और सबसे गहरे भू-तापीय कुओं का शुभारंभ

भारत ने 17 जुलाई 2026 को नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए लद्दाख की पोगा घाटी में देश के पहले और सबसे गहरे भू-तापीय (जियोथर्मल) कुओं का संचालन शुरू किया। लद्दाख के उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना ने 1,000-1,000 मीटर गहराई वाले दो भू-तापीय कुओं का उद्घाटन किया। समुद्र तल से 14,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित यह परियोजना भारत में स्वच्छ और सतत ऊर्जा के नए विकल्पों को विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

भू-तापीय ऊर्जा क्या है और इसका महत्व

भू-तापीय ऊर्जा पृथ्वी के भीतर मौजूद प्राकृतिक ऊष्मा से प्राप्त होने वाली ऊर्जा है। इसका उपयोग बिजली उत्पादन के साथ-साथ भवनों को गर्म रखने, औद्योगिक प्रक्रियाओं और अन्य प्रत्यक्ष तापीय उपयोगों में किया जाता है। यह ऊर्जा स्रोत नवीकरणीय होने के साथ-साथ पर्यावरण के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है, क्योंकि इससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन पारंपरिक जीवाश्म ईंधनों की तुलना में काफी कम होता है। भारत ने लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह सहित कई क्षेत्रों में भू-तापीय संसाधनों की पहचान की है। इनमें पोगा घाटी सबसे संभावनाशील क्षेत्रों में गिनी जाती है।

पोगा घाटी परियोजना की प्रमुख विशेषताएं

इस परियोजना के अंतर्गत ओएनजीसी एनर्जी सेंटर द्वारा दो भू-तापीय कुओं की खुदाई की गई। पहला कुआं 22 मई 2026 को 1,000 मीटर की निर्धारित गहराई तक पहुंचा, जबकि दूसरा कुआं 3 जून 2026 को शुरू होकर 8 जुलाई 2026 को पूरा हुआ। ड्रिलिंग के दौरान लगभग 400 मीटर की गहराई पर अधिकतम 135 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया गया। वैज्ञानिक अब आगे की जांच के माध्यम से अधिक गहराई पर तापमान, जलाशय की स्थिति तथा ऊर्जा उत्पादन की संभावनाओं का मूल्यांकन कर रहे हैं, जिससे भविष्य में बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन का मार्ग प्रशस्त हो सके।

1 मेगावाट पायलट भू-तापीय विद्युत परियोजना

इन दोनों कुओं को पोगा घाटी में स्थापित 1 मेगावाट क्षमता की पायलट भू-तापीय विद्युत परियोजना से जोड़ा गया है। इस प्रकार की पायलट परियोजनाओं का उद्देश्य ड्रिलिंग तकनीक, भू-तापीय द्रव के प्रवाह, तापमान प्रोफाइल और विद्युत उत्पादन प्रणाली की कार्यक्षमता का परीक्षण करना होता है। सफल परिणाम मिलने पर भविष्य में बड़े वाणिज्यिक भू-तापीय विद्युत संयंत्र स्थापित किए जा सकते हैं।

प्रशासनिक और तकनीकी पृष्ठभूमि

यह परियोजना कुछ समय के लिए प्रशासनिक कारणों से प्रभावित हुई थी, क्योंकि लद्दाख प्रशासन, लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद-लेह और ओएनजीसी एनर्जी सेंटर के बीच हुए समझौता ज्ञापन की अवधि समाप्त हो गई थी। जून 2026 में उपराज्यपाल के हस्तक्षेप के बाद इस समझौते का पांच वर्षों के लिए नवीनीकरण किया गया, जिसके बाद परियोजना को फिर से गति मिली।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • भू-तापीय ऊर्जा को गैर-पारंपरिक एवं नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की श्रेणी में रखा जाता है।
  • पोगा घाटी, केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख का सबसे प्रसिद्ध भू-तापीय क्षेत्र माना जाता है।
  • भू-तापीय कुएं पृथ्वी के भीतर मौजूद गर्म पानी, भाप और ऊष्मा का उपयोग ऊर्जा उत्पादन के लिए करते हैं।
  • लद्दाख अपनी उच्च सौर ऊर्जा क्षमता, ठंडे रेगिस्तानी वातावरण और वैकल्पिक ऊर्जा परियोजनाओं की संभावनाओं के कारण भारत की ऊर्जा रणनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

भारत की पहली गहरी भू-तापीय परियोजना देश के स्वच्छ ऊर्जा अभियान को नई दिशा देने वाली पहल है। यदि पोगा घाटी में चल रहे परीक्षण सफल रहते हैं, तो भविष्य में भू-तापीय ऊर्जा भारत के ऊर्जा मिश्रण का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। इससे न केवल ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने और सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने में भी सहायता मिलेगी।

Originally written on July 18, 2026 and last modified on July 21, 2026.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *