मृदंगम के दिग्गज गुरुवायूर दोराई का निधन

मृदंगम के दिग्गज गुरुवायूर दोराई का निधन

कर्नाटक संगीत के वरिष्ठ मृदंगम वादक और पुदुकोट्टई शैली के प्रमुख कलाकार गुरुवायूर दोराई का 10 अक्टूबर 2026 को चेन्नई में निधन हो गया। वे आठ दशकों से अधिक समय तक संगीत जगत में सक्रिय रहे। उनका जन्म 2 जुलाई 1935 को केरल के गुरुवायूर में हुआ था। कुछ विवरणों में उनकी आयु 91 या 92 वर्ष बताई गई है।

बचपन से संगीत साधना और लंबा मंचीय सफर

दोराई ने आठ वर्ष की उम्र में मंच पर पहली प्रस्तुति दी। इस अवसर पर उन्होंने गायक चेम्बई वैद्यनाथ भागवतार के साथ मृदंगम बजाया। उनकी शुरुआती शिक्षा पलघाट सुब्बैयार से हुई और बाद में ई.पी. नारायण पिशारोडी से भी प्रशिक्षण मिला। आगे चलकर उन्होंने पालनी सुब्रमणिया पिल्लै से सीखकर अपनी वादन शैली को और विकसित किया।

पांच वर्ष की उम्र में पोलियो से प्रभावित होने के बाद उनके पिता ने उन्हें मृदंगम सीखने के लिए प्रोत्साहित किया। 1940 के दशक में उन्होंने अपनी बहन और गायिका गुरुवायूर पोन्नम्मल के साथ भी प्रस्तुति दी। अपने लंबे करियर में दोराई ने एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी के साथ नियमित रूप से संगत की। मुसीरी सुब्रमणिया अय्यर, सेम्मंगुडी श्रीनिवास अय्यर, एम.डी. रामनाथन, एम. बालमुरलीकृष्ण और टी.आर. महालिंगम जैसे कलाकारों के साथ उनका संगीत सहयोग रहा।

पुदुकोट्टई शैली और मृदंगम की विशेषता

मृदंगम कर्नाटक संगीत में लय का आधार देने वाला दोमुखी ताल वाद्य है। गायक या वादक की प्रस्तुति के साथ ताल को संतुलित रखना और संगीत की गति को सहारा देना मृदंग वादक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। दोराई पुदुकोट्टई शैली से जुड़े थे और मृदंगम पर उनकी ‘गुम्की’ के लिए विशेष रूप से सराहे जाते थे। गुम्की वादन में मृदंगम से गहरी और गूंजती हुई गंभीर ध्वनि उत्पन्न की जाती है।

कर्नाटक संगीत में ‘लयम्’ का संबंध ताल और लय से है, जबकि ‘अरंगेत्रम’ किसी कलाकार की पहली औपचारिक मंचीय प्रस्तुति को कहा जाता है। दोराई का आठ वर्ष की उम्र में हुआ अरंगेत्रम उनके असाधारण रूप से शुरुआती मंचीय सफर का संकेत था।

सम्मान और संगीत जगत में योगदान

दोराई को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और तमिलनाडु का कलैमामणि सम्मान मिला। वर्ष 2025 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। पद्मश्री भारत के प्रमुख नागरिक सम्मानों में शामिल है और कला सहित विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ट योगदान के लिए दिया जाता है। उनकी पहचान केवल पुरस्कारों तक सीमित नहीं थी; वे अपनी संगत, लयबोध और विशिष्ट वादन के लिए भी सम्मानित थे।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • मृदंगम कर्नाटक संगीत का प्रमुख दोमुखी ताल वाद्य है।
  • गुरुवायूर दोराई ने आठ वर्ष की उम्र में चेम्बई वैद्यनाथ भागवतार के साथ मंचीय पदार्पण किया था।
  • दोराई को वर्ष 2025 में पद्मश्री प्रदान किया गया था।
  • संगीत नाटक अकादमी संगीत, नृत्य और नाटक के क्षेत्र में भारत की राष्ट्रीय अकादमी है।

गुरुवायूर दोराई का निधन कर्नाटक संगीत जगत के लिए एक महत्वपूर्ण क्षति है। उनकी लंबी संगीत यात्रा और पुदुकोट्टई शैली में योगदान आने वाली पीढ़ियों के कलाकारों के लिए प्रेरणा बना रहेगा।

Originally written on October 11, 2026 and last modified on October 11, 2026.

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