बीड़ में बाघ की वापसी से महाराष्ट्र के वन गलियारों पर नजर
महाराष्ट्र के बीड़ जिले में करीब एक सदी बाद बाघ की मौजूदगी की पुष्टि हुई है। 20 अगस्त 2026 को आष्टी तहसील के ब्रह्मगांव वन परिक्षेत्र में लगाए गए कैमरा ट्रैप में चार वर्षीय नर बाघ दर्ज किया गया। उसका वजन 200 किलोग्राम से अधिक बताया गया है। आष्टी और पाटोदा के वन क्षेत्रों में 1910 और 1920 के दशक के बाद बाघ की यह पहली पुष्ट मौजूदगी है।
टिपेश्वर से बीड़ तक बाघ का सफर
यह बाघ यवतमाल जिले के टिपेश्वर वन्यजीव अभयारण्य से निकला था और 2023 में वहां से बाहर आया। इसके बाद उसने चंद्रपुर, धाराशिव, लातूर और अहिल्यानगर जिलों से होकर बीड़ तक की यात्रा की। दिसंबर 2024 में इसे धाराशिव में दर्ज किया गया था। बीड़ में वन कर्मचारियों को अक्टूबर 2025 में इसके पदचिह्न मिले। बाद में 10 दिसंबर 2025 और 27 जुलाई 2026 को आष्टी के पहाड़ी क्षेत्र में भी इसकी मौजूदगी दर्ज हुई।
ब्रह्मगांव में कैमरा ट्रैप में दर्ज होने के बाद बाघ सोलापुर जिले में बार्शी के निकट करी क्षेत्र की ओर बढ़ा। फिलहाल यह पाटोदा तालुका की बालाघाट पर्वतमाला को अपना क्षेत्र बनाए हुए है। इसे अनौपचारिक रूप से ‘रामलिंग’ या ‘एवेंजर’ कहा जाता है।
बाघों के आवागमन और संरक्षण का महत्व
बाघ का वैज्ञानिक नाम पैंथेरा टाइग्रिस है। भारत में पाई जाने वाली बाघ उपप्रजाति बंगाल बाघ है, जिसका वैज्ञानिक नाम पैंथेरा टाइग्रिस टाइग्रिस है। बाघ क्षेत्रीय स्वभाव वाले मांसाहारी जीव हैं। अपने लिए नया क्षेत्र और शिकार तलाशते हुए कुछ बाघ एक वन क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक जा सकते हैं। बीड़ में इस बाघ की मौजूदगी अलग-अलग जिलों के वन क्षेत्रों के बीच उसके लंबे आवागमन को दर्शाती है।
भारत में वन्यजीवों को कानूनी संरक्षण वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत मिलता है। बाघ इस कानून की अनुसूची-I में शामिल है। बाघों के संरक्षण और उनके आवास के प्रबंधन के लिए 1973 में केंद्र प्रायोजित ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ शुरू किया गया था। बीड़ में कैमरा ट्रैप और पदचिह्नों से लगातार निगरानी इस क्षेत्र में बाघ की गतिविधियों को समझने में मदद करती है।
स्थानीय लोगों के लिए वन विभाग की सलाह
वन अधिकारियों ने ग्रामीणों और पशुपालकों से बाघ के आने-जाने वाले वन क्षेत्रों से दूर रहने की सलाह दी है। अब तक इस बाघ ने किसी व्यक्ति पर हमला नहीं किया है। फिर भी वन क्षेत्रों में सतर्कता जरूरी है। कैमरा ट्रैप से तस्वीरें और पदचिह्नों के अभिलेख वन कर्मचारियों को बाघ की मौजूदगी और उसके संभावित आवागमन पर नजर रखने में सहायता देते हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- बाघ का वैज्ञानिक नाम पैंथेरा टाइग्रिस है।
- भारत में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत 1973 में हुई थी।
- वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 में बनाया गया था और बाघ इसकी अनुसूची-I में शामिल है।
- टिपेश्वर वन्यजीव अभयारण्य महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में स्थित है।
बीड़ में बाघ की वापसी वन्यजीवों के बदलते आवागमन पर ध्यान खींचती है। वन विभाग की निगरानी और स्थानीय लोगों की सतर्कता, दोनों ही इस स्थिति में महत्वपूर्ण हैं।